धार्मिक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार (RTE) में शामिल करने संबंधी याचिका
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने धार्मिक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार (RTE) में शामिल करने संबंधी याचिका अस्वीकार कर दी है
उच्चतम न्यायालय ने निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम (वर्ष 2009) से जुड़ी एक याचिका को अस्वीकार कर दिया है। याचिका में इस अधिनियम की धारा 1(4) और 1(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
धारा 1(5) : इस अधिनियम की कोई बात मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थाओं पर लागू नहीं होगी।
धारा 1(4) : इस अधिनियम के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के उपबंधों के अधीन होंगे।
याचिकाकर्ता के तर्कः
- उपर्युक्त प्रावधान इन संस्थानों को शैक्षिक उत्कृष्टता (educational excellence) से वंचित करते हैं।
- एक बालक का अधिकार केवल निःशुल्क शिक्षा तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समान गुणवत्ता वाली शिक्षा तक विस्तारित किया जाना चाहिए। इसलिए, इस जनहित याचिका में देश भर में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों के लिए एक समान पाठ्यक्रम और कार्यक्रम का प्रस्ताव किया गया है।
अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के विनियमन पर उच्चतम न्यायालय के विचारः
टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन मामला (2002): संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों के अधिकार न तो असीमित हैं और न ही कानून से ऊपर हैं। राष्ट्रीय हित में बनाया गया कोई भी विनियम अनिवार्य रूप से सभी संस्थानों पर लागू होना चाहिए।
एसके मो. रफीक मामला (2020): यदि उद्देश्य अल्पसंख्यक संस्थान में उत्कृष्टता सुनिश्चित करना है, तो विनियमन की अनुमति दी जा सकती है।
वर्ष 2014 में, प्रमति मामले में निर्णय दिया गया था कि RTE अधिनियम के संपूर्ण प्रावधान अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होंगे।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 29(1): नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है।
- अनुच्छेद 30(1): धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।
स्रोत –द हिन्दू