बैंकों के पुनर्पूजीकरण

बैंकों के पुनर्पूजीकरण

हाल ही में RBI द्वारा जारी एक वर्किंग पेपर में, सरकार द्वारा बैंकों के पुनर्पूजीकरण (recapitalization) से बैंकों को होने वाले लाभ और सामाजिक क्षेत्र में सरकारी व्यय में कमी के बीच संतुलन पर बल दिया गया है ।

  • RBI के इस वर्किंग पेपर में “ब्लैक स्वान इवेंट” को देखते हुए बैंकों के पुनर्पूजीकरण के लिए एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया गया है।
  • बैंक पुनपूँजीकरण (Bank recapitalisation) का अर्थ है- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) में अधिक पूंजी डालना, ताकि वे पूँजी की कमी से निपटने के साथ-साथ बेसल मानदंडों का पालन करने में सक्षम हो पाएं । भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए बेसल मानदंडों पर आधारित, पूंजी पर्याप्तता मानदंड (capital adequacy norms) निर्धारित किये हैं। यह कदम मुख्य रूप से RBI के इन्हीं दिशा-निर्देशों को पूरा करने के लिए उठाया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के तहत, सरकार PSBS के नये शेयर खरीदकर या बॉण्ड जारी कर बैंकों में पूंजी डालती है। भारत सरकार PSBs में सबसे बड़ी शेयरधारक भी है।
  • ज्यादातर सरकारी बैंक अक्सर NPAS (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) की समस्या से निपटने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार समय-समय पर बैंकों को डूबने से बचाए रखने के लिए पुनर्पूजीकरण की घोषणा करती रहती है।
  • इससे पहले, अक्टूबर 2017 और 2019 में, बैंक पुनपूँजीकरण कार्यक्रमों की घोषणा की गई थी।

RBI के इस वर्किंग पेपर के मुख्य निष्कर्षों पर एक नज़रः

  • इन पुनपूँजीकरण पैकेजों के माध्यम से कंपनियों या फर्मों को बेहतर और रियायती आजीवन लाभ देने के अपने फायदे हो सकते हैं। लेकिन, इस कारण सामाजिक क्षेत्रों में सरकारी खर्च कम होने का नुकसान गरीब परिवारों को भुगतना पड़ सकता है।
  • इसलिए वर्किंग पेपर में, सार्वजनिक नीति निर्माण में इस फायदे-नुकसान को संतुलित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

स्रोत हिन्दू

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