“सिंथेटिक बायोलॉजी” पर नीति निर्माण
हाल ही में केंद्र सरकार “सिंथेटिक बायोलॉजी” पर नीति निर्माण पर विचार कर रही है।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने सिंथेटिक बायोलॉजी पर दूरदर्शिता पत्र के रूप में एक प्रारूप तैयार किया है। इस पत्र में एक राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता पर बल दिया गया है,जो इस मुद्दे पर भारत के पक्ष को मजबूत करेगी।
सिंथेटिक बायोलॉजी से आशय उन जैविक घटकों और प्रणालियों के डिजाइन, री-डिजाइन एवं निर्माण से है, जो प्रकृति में पहले से अस्तित्व में नहीं हैं।
सिंथेटिक बायोलॉजी के संभावित अनुप्रयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में हैं:
जैव उपचार (बायोरेमेडिएशन), बायोसेंसर एवं स्वास्थ्य (बायोसेंसर-आधारित उपचार, विशेष रोगजनकों को लक्षित करने के लिए संशोधित बैक्टीरिया आदि), फूड फोर्टिफिकेशन इत्यादि।
सिंथेटिक बायोलॉजी के उपयोग से जुड़ी चिंताएं:
- बायोसेफ्टीः मनुष्यों में एलर्जी, एंटीबायोटिक प्रतिरोध, कैंसर कारक और विषाक्तता जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।
- बायोसिक्योरिटीः इसका संबंध जैविक हथियार विकसित करने के लिए संभावित रूप से खतरनाक जैविक अभिकारकों या जैव प्रौद्योगिकी के अनुचित या दुर्भावनापूर्ण उपयोग से है। मानव यूजेनिक्स (eugenics) से संबंधित नैतिक चिंताएं आदि। यूजेनिक्स का अर्थ भविष्य की पीढ़ियों को बेहतर बनाने के लिए वांछित आनुवंशिक विशेषताओं का चयन करना है।
भारत में विनियमन की स्थितिः
- संसद ने अभी तक भारतीय जैव प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण विधेयक, 2013 को मंजूरी नहीं दी है। इसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुसंधान को विनियमित करने के प्रावधान शामिल हैं। इसमें सिंथेटिक बायोलॉजी भी शामिल हो सकती है।
- आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) खाद्य फसलों पर विनियम बनाये गए हैं।
- इससे पहले, 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत वर्ष 2011 में सिस्टम्स बायोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी से जुड़े शोध पर एक कार्यबल का गठन किया गया था।
स्रोत –द हिन्दू