भक्ति साहित्य की प्रकृति” और भारतीय संस्कृति में इसके योगदान

Question – भारत में “भक्ति साहित्य की प्रकृति” और भारतीय संस्कृति में इसके योगदान पर टिपण्णी कीजिये। – 28 January 2022

Answer भक्ति साहित्य की प्रकृति – भक्ति आंदोलन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक अनूठी घटना है, जो विश्व इतिहास में दुर्लभ है। यह भक्ति आंदोलन था जिसने भारतीयों को भावनात्मक और राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधा।

भक्ति आंदोलन का विकास सातवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच तमिलनाडु में हुआ। मूल रूप से दक्षिण भारत में 9वीं शताब्दी में शंकराचार्य द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन भारत के सभी हिस्सों में 16 वीं शताब्दी तक विस्तृत हुआ और कबीर, नानक तथा श्री चैतन्य ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भक्ति साहित्य की प्रकृति

समावेशी साहित्य:

  • इसने सांप्रदायिकता और जातिवाद को हटाने का उपदेश दिया। भक्ति साहित्य ने पारंपरिक समाज के अपरंपरागत रीति-रिवाजों के खिलाफ जातियों और बाहरी जातियों को शामिल करने का आह्वान किया।
  • मुस्लिम कवियों दौलत काज़ी और सैयद अलाओल ने ऐसी कविताएँ लिखीं जो हिंदू धर्म और इस्लाम का सांस्कृतिक संश्लेषण थीं।

अंतर-धार्मिक सद्भाव:

  • भक्ति और सूफी आंदोलनों ने एक दूसरे का समर्थन किया और विभिन्न सूफी संतों के पाठों को सिखों के धार्मिक सिद्धांतों में स्थान मिला। श्री गुरु ग्रंथ साहिब ने कबीर की शिक्षाओं को शामिल किया।
  • स्थानीय भाषाओं को अपनाने से भक्ति पंथ का प्रसार हुआ जिसे जनता आसानी से समझ सकती थी।

भक्ति साहित्य का योगदान

आचार्यों ने भक्ति काव्य को एक विराट आंदोलन में विवेचित-विश्लेषित करते हुए यह पाया है कि प्रथम बार भारतीय समाज का आधार भूमि इतनी विशुद्ध हो सकी है कि जाति सम्प्रदाय, धर्म एवं अन्य सामाजिक भेद बहुत पीछे छूट गए हैं । जैसा कि मुक्तिबोध का मानना है कि, प्रथम बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किए तथा प्रथम बार युगों-युगों से दलित शोषित जनता, अभिजात्य वर्ग के सामने सिर उठाकर खड़ी हो सकी ।

यह भक्ति आंदोलन की ही देन है । वस्तुतः भक्ति जिस संदर्भ में आन्दोलनात्मक तेवर प्राप्त करती है, वह स्वभावतः सामाजिक ही हो सकता है । आचार्य शुक्ल प्रथम समीक्षक थे, जिन्होंने भक्ति काव्य का मूल्यांकन लोक धर्म और लोक जागरण की दृष्टि से किया, यद्यपि उनकी अपनी कुछ सीमाएँ है जिसके तहत वे मन्त काव्य धारा में अन्तर्निहित प्रगतिशील वस्तुतत्व का सटीक विश्लेषण नहीं कर सके ।

भाषाओं के पूर्वी समूह में, बांग्ला का प्रयोग चैतन्य और कवि चंडीदास द्वारा किया जाता था, जिन्होंने राधा और कृष्ण के प्रेम के विषय पर विस्तार से लिखा था। शंकरदेव भी भक्ति कवि थे, जिन्होंने 15वीं शताब्दी में ब्रह्मपुत्र घाटी में असमी भाषा को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने अपने विचारों को फैलाने के लिये एक बिल्कुल नए माध्यम का इस्तेमाल किया।

आज के महाराष्ट्र में एकनाथ और तुकाराम जैसे संतों के हाथों मराठी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। कबीर, नानक और तुलसीदास जैसे अन्य प्रमुख संतों ने अपने मनोरम छंदों और आध्यात्मिक व्याख्याओं के साथ क्षेत्रीय साहित्य एवं भाषा में काफी योगदान दिया।

भक्ति और सूफीवाद के प्रभाव से एक नई सांस्कृतिक परंपरा का उदय। साथ ही सिख धर्म, कबीर पंथ आदि जैसे नए संप्रदायों का उदय हुआ।

वेदांत के बाद के विचारों की खोज माधवाचार्य ने अपने द्वैताद्वैत, रामानुजाचार्य ने अपने विशिष्ट अद्वैत आदि में की थी। एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में, इसने काव्य को राजाओं की स्तुतिगान से मुक्त किया, और आध्यात्मिक विषयों को पेश किया।

शैली की दृष्टि से, इसने विभिन्न भाषाओं में वचन (कन्नड़ में), साखियों, दोहों और अन्य रूपों जैसी सरल एवं सुलभ शैलियों की शुरुआत की, तथा संस्कृत छंद के आधिपत्य को समाप्त कर दिया।

उनके द्वारा रचे गए भक्ति आंदोलन के विचारों ने साहित्य के विशाल संग्रह के माध्यम से समाज के सांस्कृतिक लोकाचार में प्रवेश किया। उनके विचारों की अनुरूपता ने न केवल हमें संभावित आंतरिक संघर्षों से बचाया बल्कि सहनशीलता की भावना भी पैदा की। उन्होंने जनता से अपील करने और उन्हें अज्ञानता से मुक्त करने के लिए गीतों, कहावतों और कहानियों में संदेशों की रचना की, जिससे अवधी, भोजपुरी, मैथिली और कई अन्य भाषाओं का विकास हुआ।

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