दक्षिण अफ्रीका चीता लाने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर

दक्षिण अफ्रीका चीता लाने  के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर

हाल ही में दक्षिण अफ्रीका सरकार ने मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क (KNP) में 12 चीतों के स्थानांतरण के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

प्रमुख बिंदु

  • दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा द्वारा मंजूरी के कुछ दिनों बाद दक्षिण अफ्रीका के पर्यावरण मंत्रालय ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • इससे पहले 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर नामीबिया से आठ चीते तीन नर और पांच मादा कूनो पार्क में छोड़े गए थे।
  • फ़रवरी-मार्च 2023 तक देश में चीतों की दूसरी खेप आने की उम्मीद है, जिससे कूनो राष्ट्रीय उद्यान अफ्रीका से इस बिग कैट की कुल संख्या 20 हो जाएगी।
  • इन 12 चीतों को जुलाई 2022 से दो अलग-अलग स्थानों – क्वाजुलु-नताल प्रांत के फ़िंदा में तीन और लिम्पोपो प्रांत के रूइबर्ग में – क्वारेंटाइन सुविधाओं में रखा गया है।
  • सरकार के अनुसार, दक्षिणी अफ्रीकी चीते, चीता की अन्य सभी प्रजातियों के पूर्वज हैं इसलिए इनका भारत में पुनर्वास कार्यक्रम एक आदर्श हो सकता है।
  • बता दें कि प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में चीतों को फिर से लाया जा रहा है, जिसे आधिकारिक तौर पर “भारत में चीता के पुनर्वास के लिए कार्य योजना” (Action Plan for Introduction of Cheetah in India) के रूप में जाना जाता है।
  • परियोजना के तहत 50 चीतों को पांच साल की समय सीमा में भारत के राष्ट्रीय उद्यानों में फिर से बसाया जाएगा।

चीतों के पुनर्वास के फायदे

  • चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान ला कर छोड़ा जाना मूल चीता हैबिटैट और उनकी जैव विविधता के संरक्षण के लिए तैयार एक प्रोटोटाइप या मॉडल का हिस्सा है।
  • इससे जैव विविधता के क्षरण और तेजी से नुकसान को रोकने में मदद मिलेगी।
  • एक शीर्ष शिकारी जीव को वापस ला कर यहां पुनर्वास से ऐतिहासिक विकासवादी संतुलन
  • पुनः स्थापित होगा जिसका इकोसिस्टम के विभिन्न स्तरों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
  • चीता के पुनर्वास से इनके संरक्षण की दिशा में व्यापक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। चीता एक ऐसा जीव है जो गति के मामले में भारतीय मृगों और गज़ेल को भी पीछे छोड़ देता है।
  • चीता को फिर से बसाकर न केवल इसके शिकार आधार को बचाने में सक्षम होंगे जिसमें से कुछ प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं बल्कि घास के मैदानों की अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों और खुले वनों के इकोसिस्टम को भी बचाने में सक्षम होंगे। इनमें से कुछ विलुप्त होने के कगार पर हैं।

अफ्रीकी चीता / एशियाई चीता

  • भारत के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद, चीता को 1952 में हैबिटैट नुकसान और अवैध शिकार के कारण देश से विलुप्त घोषित कर दिया गया था।
  • चीते 70mph (113 km/h ) तक की गति तक दौड़ सकते हैं, जिससे वे दुनिया के सबसे तेज़ ज़मीन वाले जानवर बन जाते हैं।
  • चीता एकमात्र बड़ा मांसाहारी है जो भारत से पूरी तरह से विलुप्त हो गया है। भारत में आखिरी चीता की मृत्यु 1948 में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के साल जंगलों में हुई थी।
  • दुनिया भर में केवल लगभग 7,000 चीते प्राकृतिक माहौल में मौजूद हैं।
  • अफ्रीकी चीता को प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) के तहत खतरे वाली प्रजातियों की लाल सूची के तहत एक वल्नरेबल प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • नामीबिया में चीतों की दुनिया की सबसे बड़ी संख्या मौजूद है।
  • एशियाई चीता, जो कभी अरब प्रायद्वीप से अफगानिस्तान तक के विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता था, एक क्रिटिकली एनडेंजर्ड प्रजाति है और अब केवल ईरान में मौजूद है। ऐसा अनुमान है कि केवल 12 एशियाई चीता ही जीवित हैं।

स्रोत – पी.आई.बी.

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