सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतरिम रिपोर्ट को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतरिम रिपोर्ट को किया खारिज

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतरिम रिपोर्ट को खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए आरक्षण पहले की तरह लागू होने तक स्थानीय निकायों के कोई चुनाव नहीं होंगे ।

  • महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस अंतरिम रिपोर्ट के माध्यम से स्थानीय निकायों में OBCs के लिए 27% आरक्षण की बहाली की सिफारिश की थी।
  • इससे पहले दिसंबर 2021 में, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में OBCs के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव कराने पर रोक लगा दी थी। इस रोक के पीछे कारण यह था कि राज्य सरकार ने कोटा निर्धारित करने से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अनिवार्य “ट्रिपल-टेस्ट (तिहरा परीक्षण) निर्देश का पालन नहीं किया था।
  • इसके बाद, राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने पास पहले से उपलब्ध जानकारी/डेटा के आधार पर शेष चुनाव कराने की अनुमति देने का अनुरोध किया था।
  • उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से डेटा को राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को सौंपने का आदेश दिया। अब इस आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंप दी है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ट्रिपलटेस्ट में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • राज्य के भीतर स्थानीय निकायों के संबंध में OBCs के लिए पिछड़ेपन की प्रकृति और इसके पहलुओं की समसामयिक आधार पर कड़ाई से जाँच करना। इसे अनुभवजन्य जाँच (empirical inquiry) कहा जाता है। यह कार्य एक समर्पित आयोग का गठन करके पूरा करना होता है।
  • इसके बाद आयोग की सिफारिशों के आधार पर अलग-अलग स्थानीय निकायों में आरक्षण का प्रावधान करने के लिए अनिवार्य आरक्षण के अनुपात को निर्धारित किया जाता है साथ ही, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित सीट, कुल सीटों के 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • स्थानीय निकायों में OBCs के लिए 27% आरक्षण के प्रावधान को खारिज करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय वर्ष 2010 के कृष्ण मूर्ति वाद पर आधारित है।
  • यह केस (या वाद)स्थानीय निकायों में आरक्षण के मुद्दे से संबंधित था।
  • भारत के संविधान के तहत, स्थानीय स्तर पर OBCs को आरक्षण प्रदान करना एक स्वैच्छिक (विवेकाधीन या वैकल्पिक) प्रावधान है। इसके विपरीत संविधान, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों को अनिवार्य (बाध्यकारी) रूप से आरक्षित करने का प्रावधान करता है।

स्रोत द हिन्दू

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