Daily Mains Answer Writing Programme

प्रश्न – क्या भारत को अपने परमाणु नीति को संशोधित करना चाहिए? टिप्पणी करें ।

प्रश्न – क्या भारत को अपने परमाणु नीति को संशोधित करना चाहिए? टिप्पणी करें । – 24 July 2021

उत्तर

  • भारत में परमाणु नीति को ले कर एक बेहद दिलचस्प बहस चल रही है। कई कारणों से इसकी जरूरत भी काफी बढ़ गई है। देश में दक्षिणपंथी झुकाव वाली ऐसी सरकार है जो भारत की विदेश और रक्षा नीति में नाटकीय परिवर्तन करने से झिझकने वाली नहीं। साथ ही भारत के रणनीतिक चिंतक रणनीतिक परमाणु हथियारों पर पाकिस्तान की निर्भरता को ले कर चिंता जता रहे हैं और उस पर से पाकिस्तान और चीन का गठजोड़ मजबूत होता जा रहा है। इन कारणों से भारत के विकल्पों में तो कमी आई ही है हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सत्ता संतुलन में भी बदलाव आया है।
  • पहले उपयोग नहीं करने (NFU) की नीति भारत की परमाणु नीति का आधार रहा है और भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने अब तक इसमें बदलाव का कोई प्रस्ताव भी नहीं किया है। लेकिन इसने अपने 2014 के चुनाव घोषणापत्र में वादा किया था कि यह “भारत की परमाणु नीति का विस्तार से अध्ययन कर इसे संशोधित करेगी और इसे मौजूदा समय में हो रहे बदलावों के अनुकूल करगी।” उधर, अभी कुछ हफ्तों पहले तक देश के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने भारत की परमाणु हथियारों के पहले उपयोग नहीं करने की नीति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था, “बड़ी संख्या में लोग यह क्यों कहते हैं कि भारत की नीति है कि वह पहले इसका इस्तेमाल नहीं करेगा… मुझे कहना चाहिए कि मैं एक जवाबदेह परमाणु शक्ति हूं और मैं इसका गैर-जवाबदेही से उपयोग नहीं करूंगा, और एक व्यक्ति के तौर पर, कई बार मुझे लगता है कि मैं यह क्यों कहूं कि मैं इसका पहले इस्तेमाल नहीं करने वाला हूं। मैं यह नहीं कह रहा कि आपको सिर्फ इसलिए इसका पहले उपयोग करना है क्योंकि आपने यह फैसला नहीं किया है कि आपको पहले इसका उपयोग नहीं करना है। इससे धूर्त ताकतों को काबू किया जा सकता है।”
  • लेकिन इन दिनों जिससे विवाद खड़ा हुआ है, वह है भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन की हाल की किताब का वह अंश जिसमें उन्होंने लिखा है: “भारत किसी दूसरे परमाणु शक्ति वाले राष्ट्र (एनडब्लूएस) के खिलाफ अपने परमाणु हथियारों का पहला इस्तेमाल कब करेगा, इसको ले कर पूरी तरह स्पष्टता नहीं है। परिस्थितियां ऐसी हैं जिनमें कुछ मामलों में भारत को इसका पहला इस्तेमाल उपयोगी लग सकता है। उदाहरण के तौर पर, ऐसे एनडब्लूएस के खिलाफ जो घोषित कर दे कि वह निश्चित तौर पर अपने हथियारों का उपयोग करेगा और भारत को यह निश्चित तौर पर लग जाए कि विरोधी पक्ष की ओर से इसका प्रयोग निश्चित तौर पर होने वाला है।”
  • इसने कई लोगों को यह तर्क देने के लिए प्रेरित किया है कि यह भारत की परमाणु नीति में एक बड़ा बदलाव है और कुछ परिस्थितियों में नई दिल्ली अपनी एनएफयू नीति को छोड़ सकती है। जब उसे लगे कि इस्लामाबाद उसके खिलाफ हथियारों का इस्तेमाल करने जा रहा है तो वह पहले पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। पश्चिम में कई लोग इसे भारत के रवैये में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखते हैं जो दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिरता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • लेकिन आज तक नई दिल्ली सरकार या प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई संकेत नहीं दिया है कि भारत की परमाणु नीति में कोई बदलाव होने वाला है। बल्कि, नई दिल्ली के लिए ऐसे समय में ऐसा करना बहुत ही अतार्किक होगा जब वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने के लिए कूटनीतिक रूप से संघर्ष कर रहा हो। इस तरह की कोई भी पहल एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में भारत की पहचान को खतरे में डाल सकती है।
  • दूसरी बात यह है कि मेनन इस सरकार का हिस्सा ही नहीं है। उनकी किताब तो कांग्रेस नेतृत्व वाली पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की मनमोहन सिंह सरकार के दौरान के उनके कर्यकाल के बारे में हैं। अगर उनके दावों को माना भी जाए तो इसका मतलब यही होगा कि इस सोच को ले कर अभी हाल-फिलहाल में कोई बदलाव नहीं हुआ है। भारतीय नीति निर्माता, चाहे वे किसी भी विचारधारा के रहे हों, वर्षों से पाकिस्तान की दुस्साहसी विदेश नीति से निपटने में लगे रहे हैं। दरअसल, मेनन की किताब पाकिस्तान को भारत के खिलाफ आतंकवादी हमले करने के लिए परमाणु रक्षा-कवच उपलब्ध होने की बात करती है, जिसकी वजह से उसे लगता है कि भारत बदले की कार्रवाई नहीं करेगा। बात इसी तथ्य के संदर्भ में कही गई जिसे भारत के रवैये को ले कर आए बदलाव के लिहाज से देखा जा रहा है।
  • पाकिस्तान को ले कर ऐसी असहजता और चीन-पाक की बढ़ती करीबी के बावजूद भारत की परमाणु नीति को ले कर बहस अभी शुरू ही हुई है। किसी भी तरह से यह नहीं माना जा सकता कि यह चर्चा ऐसे मुकाम पर पहुंच गई हो जहां यह कहा जाए कि अब इसमें कोई अहम बदलाव होने वाला है। भारत की परमाणु नीति 1999 में तय हुई थी और अब इसकी समीक्षा बेहद जरूरी हो गई है। किसी भी अहम नीति की नियमित रूप से समीक्षा बहुत जरूरी है और भारतीय परमाणु नीति को भी मौजूदा समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए खुद को तैयार करना होगा। लेकिन कोई बहस शुरू हुई है, इसका तुरंत यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि नीति किसी खास ओर जा रही है।

पहले की सरकारों की तरह ही मौजूदा सरकार भी एक गलती जरूर कर रही है। इसने अपनी आधिकारिक नीति को ले कर बोलने की छूट बहुत से लोगों को दे दी है। मोदी सरकार को अपनी परमाणु नीति एक बार फिर से घोषित करनी चाहिए। यह बिल्कुल साफ और स्पष्ट शब्दों में हो और साथ ही इसमें दुश्मनों और दोस्तों दोनों का ही खयाल रखा गया हो। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि यह नीति वाशिंगटन या लंदन से नहीं नई दिल्ली के गर्भ से ही निकलनी चाहिए।

 

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Question – Should India revise its Nuclear Doctrine? Comment on it.

Question – Should India revise its Nuclear Doctrine? Comment on it. – 24 July 2021

Answer

  • There is a very interesting debate going on in India regarding nuclear policy. Its need has also increased considerably due to many reasons. The country has a right-wing government that is not shy about making dramatic changes in India’s foreign and defense policy. At the same time, India’s strategic thinkers are expressing concern about Pakistan’s dependence on strategic nuclear weapons, and on that the ties between Pakistan and China are getting stronger. These factors have not only reduced India’s options, but also changed the balance of power in the Indo-Pacific region.
  • The no-first-use (NFU) policy has been the cornerstone of India’s nuclear policy and the BJP-led government has so far made no proposal to change it. But it promised in its 2014 election manifesto that it would “study India’s nuclear policy in detail and revise it and adapt it to the current changes.” On the other hand, Manohar Parrikar, who was the country’s Defense Minister till a few weeks ago, had questioned India’s policy of no first use of nuclear weapons. He had said, “Why do a large number of people say that India has a policy that it will not use it first… I must say that I am an accountable nuclear power and I will not use it irresponsibly, and a person As in, there are times I wonder why I say I’m not going to use it in the first place. I’m not saying you have to use it first just because you haven’t decided that you don’t have to use it first. By this sly forces can be controlled.”
  • But what has sparked controversy these days is an excerpt from a recent book by Shiv Shankar Menon, former National Security Advisor of India, in which he wrote: “India can use its nuclear weapons against any other Nuclear Powered Nation (NWS). There is no complete clarity about when to use it for the first time. Circumstances are such in which India may find its first use useful in some cases. For example, against an NWS that declares that it will definitely use its weapons and makes India feel certain that it is definitely going to be used by the opposing side.
  • This has led many to argue that this is a major shift in India’s nuclear policy and that New Delhi may under certain circumstances abandon its NFU policy. When it feels that Islamabad is going to use weapons against it, it can attack Pakistan first. Many in the West see this as a significant change in India’s attitude that could be very important for the strategic stability of South Asia.
  • But till date, the New Delhi government or the Prime Minister’s Office has not given any indication that there is going to be any change in India’s nuclear policy. Rather, it would be highly illogical for New Delhi to do such a thing at a time when it is struggling so diplomatically to join the Nuclear Suppliers Group. Any such initiative could threaten India’s identity as a responsible nuclear power.

 

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प्रश्न – बेरोजगारी से क्या तात्पर्य है? भारत में बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति की व्याख्या करते हुए इसे दूर करने के लिए चलाये जा रहे प्रमुख कार्यक्रमों की चर्चा कीजिए।

प्रश्न बेरोजगारी से क्या तात्पर्य है? भारत में बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति की व्याख्या करते हुए इसे दूर करने के लिए चलाये जा रहे प्रमुख कार्यक्रमों की चर्चा कीजिए। – 23 July 2021

उत्तर – 

जब किसी देश में काम करने वाली जनशक्ति अधिक होती है और लोगों को काम करने के लिए सहमत होने के बाद भी प्रचलित मजदूरी पर काम नहीं मिलता है, तो ऐसी स्थिति को बेरोजगारी कहा जाता है। बेरोजगारी का सबसे उपयुक्त पैमाना ‘बेरोजगारी दर’ है, जो बेरोजगार लोगों की संख्या को श्रम बल में लोगों की संख्या से विभाजित करके प्राप्त किया जाता है।

आम तौर पर 15-59 वर्ष के आयु वर्ग के आर्थिक रूप से असक्रिय व्यक्तियों को बेरोजगार माना जाता है, यदि वे लाभकारी रूप से नियोजित नहीं हैं। भारत में बेरोजगारी संबंधी आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) द्वारा जारी किए जाते हैं। भारत में अधिकांश रोजगार असंगठित क्षेत्र द्वारा प्रदान किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि श्रमिक और शहरी क्षेत्रों में अनुबंध श्रमिक असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) किसी व्यक्ति की निम्नलिखित गतिविधि स्थितियों पर रोजगार और बेरोजगारी को परिभाषित करता है:

  • कार्यशील (एक आर्थिक गतिविधि में लगा हुआ) यानी ‘रोजगार प्राप्त’।
  • काम की तलाश में या काम के लिए उपलब्ध यानी ‘बेरोजगार’।
  • काम के लिए न तो तलाश है और न ही उपलब्ध होना।

बेरोजगारी के प्रमुख प्रकार:

  • संरचनात्मक बेरोजगारी: संरचनात्मक बेरोजगारी वह है, जो अर्थव्यवस्था में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होती है। भारत में बहुत से लोगों को आवश्यक कौशल की कमी के कारण नौकरी नहीं मिलती है और शिक्षा का खराब स्तर के कारण उन्हें प्रशिक्षित करना मुश्किल बना देता है।
  • प्रच्छन्न बेरोजगारी : प्रच्छन्न बेरोजगारी वह बेरोजगारी है जिसमें कुछ लोगों की उत्पादकता शून्य होती है अर्थात इन लोगों को उस काम से हटा भी दिया जाए तो भी उत्पादन में कोई अंतर नहीं आएगा।
  • मौसमी बेरोजगारी: इसमें व्यक्ति को साल के कुछ ही महीनों में रोजगार मिल जाता है। यह भारत में कृषि क्षेत्र में बहुत आम है, क्योंकि अधिक लोगों को बुवाई और कटाई के मौसम में काम मिलता है, लेकिन वे शेष वर्ष के लिए निष्क्रिय रहते हैं।
  • चक्रीय बेरोजगारी: इस प्रकार बेरोजगारी कि अवस्था तब होती है जब अर्थव्यवस्था में चक्रीय उतार-चढ़ाव का दौर आता हैं। आर्थिक उछाल और मंदी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएं हैं। आर्थिक उछाल के समय में रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं, जबकि मंदी की दशा में रोजगार की दर कम हो जाती है।
  • प्रतिरोधात्मक या घर्षण जनित बेरोजगारी: एक व्यक्ति जो एक रोजगार छोड़कर दूसरे में चला जाता है, दो रोजगारों के बीच की अवधि के दौरान बेरोजगार हो सकता है, या ऐसा हो सकता है कि कोई व्यक्ति नई तकनीक के उपयोग के कारण एक रोजगार से बाहर निकल सकता है या निकाल दिया जा सकता है। यदि व्यक्ति इस कारण से रोजगार की तलाश कर रहे हैं, तो पुरानी नौकरी छोड़ने और नई नौकरी पाने की अवधि की बेरोजगारी को घर्षण बेरोजगारी कहा जाता है।

भारत में बेरोजगारी दूर करने के लिए चलाये जा रहे प्रमुख कार्यक्रम:

  • प्रधान मंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, पीएमईजीपी: विनिर्माण क्षेत्र के लिए 25 लाख रुपये और सेवा क्षेत्र के लिए 10 लाख रुपये की ऋण या ऋण सीमा प्रदान की गई है। प्रधान मंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा प्रशासित एक क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी कार्यक्रम है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC), योजना के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नोडल एजेंसी है।
  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना: इस लक्ष्य के तहत 2022 तक 500 मिलियन कुशल कर्मियों का निर्माण करना है।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन: सार्वभौमिक सामाजिक एकजुटता लाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना के तहत, प्रत्येक ग्रामीण परिवार की कम से कम एक महिला सदस्य को स्वयं सहायता समूह नेटवर्क में लाया जाना है। इस मिशन के तहत जम्मू-कश्मीर के युवाओं के लिए ‘हिमायत’ और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित युवाओं के लिए ‘रोशनी’ योजना शुरू की गई थी।
  • मनरेगा: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के रूप में भी जाना जाता है, 25 अगस्त, 2005 को अधिनियमित एक भारतीय कानून है। मनरेगा एक सौ दिनों के रोजगार के लिए कानूनी गारंटी प्रदान करता है। हर वित्तीय वर्ष। किसी भी ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों के लिए वैधानिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य संबंधी अकुशल शारीरिक कार्य करने के इच्छुक हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय (MRD), भारत सरकार राज्य सरकारों के सहयोग से योजना के समग्र कार्यान्वयन की निगरानी कर रही है।
  • दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयतेकार्यक्रम: यह श्रम सुविधा पोर्टल, आश्चर्य निरीक्षण, सार्वभौमिक खाता संख्या, प्रशिक्षु प्रोत्साहन योजना, पुनर्गठित राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना से संबंधित विषयों पर केंद्रित है।

व्यापार बंद होने और अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण नौकरी छूटने को बेरोजगारी का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता है। बेरोजगारी का एक और समान रूप से महत्वपूर्ण कारण नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल की कमी है। भारत रोजगार सृजन में मंदी से जूझ रहा है, खासकर विनिर्माण क्षेत्र में। इस क्षेत्र में बेहतर दक्षता और उच्च उत्पादकता के लिए पूंजी और मशीनों को मनुष्यों पर प्राथमिकता दी जाती है। बेरोजगारी के सभी कारणों को उचित प्राथमिकता देकर समाधान खोजने की जरूरत है।

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Question – What is meant by unemployment? Explaining the present situation of unemployment in India, discuss the main programs being run to remove it.

Question – What is meant by unemployment? Explaining the present situation of unemployment in India, discuss the main programs being run to remove it. – 23 July 2021

Answer – 

When the manpower working in a country is more and people do not get work at the prevailing wages even after agreeing to work, then such condition is called unemployment. The most appropriate measure of unemployment is the ‘unemployment rate’, which is obtained by dividing the number of unemployed people by the number of people in the labor force.

Normally economically active persons in the age group of 15-59 years are considered unemployed if they are not gainfully employed. The unemployment related statistics in India is released by the National Sample Survey Office (NSSO). Most of the employment in India is provided by the unorganized sector. Agricultural workers in rural areas and contract workers in urban areas come under the unorganized sector.

The National Sample Survey Organization (NSSO) defines employment and unemployment on the following activity conditions of an individual:

  • Working (engaged in an economic activity) means ‘Employed’.
  • Seeking or available for work. means, ‘Unemployed’.
  • Neither seeking nor available for work.

Major Types of Unemployment:

  • Structural Unemployment: Structural unemployment is one that arises due to structural changes taking place in the economy. Many people in India do not find jobs due to lack of required skills and poor level of education makes it difficult to train them.
  • Disguised Unemployment: Disguised unemployment is that unemployment in which the productivity of some people is zero, that is, even if these people are removed from that work, there will be no difference in production.
  • Seasonal unemployment: In this, a person gets work in only a few months of the year. It is very common in the agriculture sector in India, as more people get work during the sowing and harvesting seasons, but they are idle for the rest of the year.
  • Cyclical unemployment: Such unemployment occurs when there are cyclical ups and downs in the economy. Economic boom and recession are the main characteristics of capitalist economy. Employment opportunities increase in times of economic boom, whereas in recessionary conditions, the employment rate decreases.
  • Resistive or Frictional Unemployment: A person who leaves one employment and moves to another, may become unemployed during the period between the two employments, or it may happen that a person may exit or be fired from one employment due to the use of new technology. If you are looking for employment because of this, then the unemployment of the period of leaving the old job and getting a new job is called frictional unemployment.

Major programs being run to remove unemployment in India:

  • Prime Ministers Employment Generation Programme, PMEGP: A credit or loan limit of Rs 25 lakh has been provided for the manufacturing sector and Rs 10 lakh for the service sector. Prime Minister’s Employment Generation Programme (PMEGP) is a credit linked subsidy programme administered by the Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises, Government of India. Khadi & Village Industries Commission (KVIC), is the nodal agency at national level for implementation of the scheme.
  • Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana: Under this target is to create 500 million skilled personnel by 2022.
  • National Rural Livelihood Mission: Under this scheme, launched with the aim of bringing universal social solidarity, at least one female member of every rural household is to be brought into the self-help group network. Under this mission, ‘Himayat’ for the youth of Jammu and Kashmir and ‘Roshni’ scheme was launched for the youth affected by Left Wing Extremism.
  • MGNREGA: Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA), also known as Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme (MGNREGA), is an Indian law enacted on August 25, 2005. MGNREGA provides a legal guarantee for one hundred days of employment every financial year. Any adult members of a rural household willing to do unskilled manual work related to public work at the statutory minimum wage. The Ministry of Rural Development (MRD), Government of India in collaboration with the State Governments is monitoring the overall implementation of the scheme.
  • Deendayal Upadhyaya ‘Shramev Jayate’ programme: Shramev Jayate scheme also known as Pandit Deendayal Upadhyaya Shramev Jayate programme, was launched by Prime Minister Narendra Modi under the Government of India on October 2014. This scheme was started as an initiative for the development of industries. It also aims to extend government assistance to provide skill training to workers. The candidates must have complete knowledge about the objectives and benefits of all the schemes under the Government of India.

Job loss due to business closures and changes in the economy cannot be considered the sole cause of unemployment. Another equally important cause of unemployment is the lack of skills required for the jobs. India is grappling with a slowdown in job creation, especially in the manufacturing sector. Capital and machines are given priority over humans for better efficiency and higher productivity in this sector. There is a need to find a solution to all the causes of unemployment by giving due priority to it.

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Question – Explaining the concept of regionalism, describe the challenges and solutions associated with it in India.

Question – Explaining the concept of regionalism, describe the challenges and solutions associated with it in India. – 22 June 2021

Answer – Regionalism is an ideology which is related to such an area, which is alive for its separate existence due to religious, economic, social or cultural reasons or continuously tries to maintain the separateness of such area. It can include issues related to the division of regions on political, administrative, cultural and linguistic basis, etc., but when the ideology of regionalism is seen with the development of a particular region, this concept becomes negative.

Reasons for the rise of regionalism:

Regionalism is not a new ideology in the Indian context. From time immemorial to the present scenario, there have been many such reasons, which have been considered important for the rise of regionalism. Some of them are as follows-

On religious grounds:

Religion is one of the main causes of regionalism. By politicizing religion, various political parties make promises of regional development to the people, which is harmful to the territorial integrity and sovereignty of the country. Promoting regionalism on the basis of religion is playing with the religious beliefs and beliefs of the people, which have been given to them by the constitution as fundamental rights.

On linguistic basis:

Integrating people or forming a region on the basis of language is one of the reasons for promoting regionalism. This linguistic dispute remained a major political issue even before independence. In 1920, the Congress party demanded the formation of states on linguistic basis. This demand was reiterated in the Nehru Report of 1927. The most controversial topic after independence was the reorganization of the states on linguistic basis, so to end this dispute, the “Dhar Commission” was constituted in the year 1948 and after that J.V.P. The reorganization of the states on linguistic basis was also recommended by the committee.

On the basis of politics:

Politics is also seen as an important factor in promoting regionalism in India. If seen from the political point of view, the problem of regionalism in India gets its strength only by the politicians. Concerned over the revolts in the Darjeeling and Naxalite areas of West Bengal in 1968, the central government’s decision to ban the possession of arms in the affected areas was considered by the state governments as interference by the central government. The dispute between the Center and the governments of Tamil Nadu, Kerala and West Bengal on the issue of ban on cow slaughter during the Janata Party regime can be considered as an example of radical regionalism.

Challenges arising out of regionalism:

The formation of new states repeatedly has a negative impact on the unity and integrity of the country. Not a single new state has emerged among the newly formed states, after which an unprecedented increase in the growth rate has been registered. Due to regionalism, there is also a negative impact on the Centre-State relations. Regionalism encourages coalition politics, which creates a dilemma in policy-making or implementation of these policies for the development of regions.

Many regional parties have emerged as a result of regionalism, due to which the interest groups of each region i.e. leaders, industrialists and politicians are seen giving priority to their own regional development. At the regional level, the religious faith of the people is used as a vote bank by various political parties by promising regional development, due to which the atmosphere of communalism and violence is created in the country. Due to regionalism, the spirit of separatism is encouraged in the country, from time to time we have also seen some examples of this such as the formation of Alpha faction in Assam, activities of Mizo National Front in Mizoram, etc. are inspired.

Solutions:

  • By developing a nationwide approach through education, awareness about the ill effects of regionalism can be developed among the people and the generations to come.
  • States have to come together as partners in each other’s development. For example, the way the thermal power stations of Punjab, Haryana are supplied with coal required for generation of electricity from Jharkhand, Odisha.
  • NITI Aayog needs to work in a better way to understand the problems and needs of the states.
  • State governments need to heed the suggestions made by the Inter-State Councils mentioned in Article-263, which have been constituted as an advisory body to resolve disputes between the States.
  • The distribution of natural and mineral resources by the central government should be done keeping in mind the needs of the states.

Along with understanding the ideology of regionalism, we also need to rethink that we are Indian first followed by Marathi, Gujarati, Punjabi etc. We should respect the sovereignty, unity and integrity of the country, ignoring our personal interests.

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प्रश्न – क्षेत्रवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भारत में इससे सम्बंधित चुनौतियों और समाधानों का विवरण प्रस्तुत कीजिए

प्रश्न – क्षेत्रवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भारत में इससे सम्बंधित चुनौतियों और समाधानों का विवरण प्रस्तुत कीजिए – 22 june 2021

उत्तर –  क्षेत्रवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसका संबंध ऐसे क्षेत्र से होता है, जो धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिये सजीव होती है या ऐसे क्षेत्र की पृथकता को यथावत बनाए रखने के लिये निरंतर प्रयासरत रहती है। इसमें राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और भाषाई आधार पर क्षेत्रों के विभाजन आदि से संबंधित मुद्दे शामिल हो सकते हैं, लेकिन जब क्षेत्रवाद की विचारधारा को किसी विशेष क्षेत्र के विकास के साथ देखा जाता है, तो यह अवधारणा नकारात्मक हो जाती है।

क्षेत्रवाद के उदय के कारण:

हालांकि भारतीय संदर्भ में क्षेत्रवाद कोई नवीन विचारधारा नहीं है। अति प्राचीन काल से वर्तमान परिदृश्य तक समय-समय पर कई ऐसे करक और कारण रहे हैं, जिन्हें क्षेत्रवाद के उदय हेतु महत्वपूर्ण माना गया है, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

धार्मिक आधार पर:

धर्म क्षेत्रवाद के मुख्य कारणों में से एक है। धर्म का राजनीतिकरण करके, विभिन्न राजनीतिक दल लोगों से क्षेत्रीय विकास के वादे करते हैं, जो देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए हानिकारक है। धर्म के आधार पर क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना लोगों की धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों के साथ खिलवाड़ है, जो उन्हें संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों के रूप में दिया गया है।

भाषायी आधार पर:

भाषा के आधार पर लोगों को एकीकृत करना या फिर किसी क्षेत्र का गठन करना क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाले कारणों में से है। यह भाषाई विवाद आजादी से पहले भी एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना रहा। 1920 में कांग्रेस पार्टी ने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग की। 1927 में नेहरू रिपोर्ट में इस मांग को दोहराया गया। आजादी के बाद सबसे विवादास्पद विषय भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन था, इसलिए इस विवाद को समाप्त करने के लिए वर्ष 1948 में धार आयोग का गठन किया गया और उसके बाद जे.वी.पी. समिति द्वारा भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की भी सिफारिश की गयी ।

राजनीति के आधार पर:

भारत में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने में राजनीति को भी एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत में क्षेत्रवाद की समस्या को केवल राजनेताओं से ही बल मिलता है। 1968 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और नक्सली इलाकों में हुए विद्रोहों से चिंतित केंद्र सरकार के प्रभावित क्षेत्रों में हथियारों के कब्जे पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार का हस्तक्षेप माना। जनता पार्टी के शासन काल में गोहत्या पर प्रतिबंध के मुद्दे पर केंद्र और तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल की सरकारों के बीच विवाद को कट्टरपंथी क्षेत्रवाद का उदाहरण माना जा सकता है।

क्षेत्रवाद से उत्पन्न चुनौतियां:

लगातार नए राज्यों के बनने से देश की अखंडता और एकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नवगठित राज्यों में एक भी नया राज्य नहीं उभरा है, जिसके बाद विकास दर में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। क्षेत्रवाद के कारण केंद्र-राज्य संबंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह  गठबंधन की राजनीति को प्रोत्साहित करता है, जो क्षेत्रों के विकास के लिए नीति-निर्माण या इन नीतियों के कार्यान्वयन में एक दुविधा पैदा करता है।

क्षेत्रवाद के परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रीय दल उभर कर सामने आए हैं, जिसके कारण प्रत्येक क्षेत्र के हित समूह अर्थात नेता, उद्योगपति और राजनेता अपने-अपने क्षेत्रीय विकास को प्राथमिकता देते हुए दिखाई दे रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा क्षेत्रीय विकास का वादा करके लोगों की धार्मिक आस्था को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे देश में सांप्रदायिकता और हिंसा का माहौल बनता है। क्षेत्रवाद के कारण देश में अलगाववाद की भावना को प्रोत्साहित किया जाता है, समय-समय पर हमने इसके कुछ उदाहरण भी देखे हैं जैसे असम में अल्फा गुट का गठन, मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की गतिविधियाँ आदि प्रेरित हैं।

निदान:

  • शिक्षा के माध्यम से एक राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण विकसित करके, लोगों और आने वाली पीढ़ियों के बीच क्षेत्रवाद के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता विकसित की जा सकती है।
  • राज्यों को एक दूसरे के विकास में भागीदार के रूप में एक साथ आना होगा। उदाहरण के लिए, जिस तरह से पंजाब, हरियाणा के थर्मल पावर स्टेशनों को झारखंड, ओडिशा से बिजली उत्पादन के लिए आवश्यक कोयले की आपूर्ति की जाती है।
  • राज्यों की समस्याओं और जरूरतों को समझने के लिए नीति आयोग को बेहतर तरीके से काम करने की जरूरत है।
  • राज्य सरकारों को अनुच्छेद -263 में उल्लिखित अंतर-राज्य परिषदों द्वारा दिए गए सुझावों पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिन्हें राज्यों के बीच विवादों को हल करने के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में गठित किया गया है।
  • केंद्र सरकार द्वारा प्राकृतिक और खनिज संसाधनों का वितरण राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

क्षेत्रवाद की विचारधारा को समझने के साथ-साथ हमें इस बात पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि हम पहले भारतीय हैं उसके बाद मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि हैं। हमें अपने व्यक्तिगत हितों की अनदेखी करते हुए देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता का सम्मान करना चाहिए।

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प्रश्न – आपदाओं का वर्गीकरण करें। भारत किन प्रकार की आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित है?

प्रश्न – आपदाओं का वर्गीकरण करें। भारत किन प्रकार की आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित है? – 21 July 2021

उत्तर – आपदाओं का वर्गीकरण

आपदा का अर्थ किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से होने वाली दुर्घटना, घटना, आपदा या गंभीर घटना, या लापरवाही से है जिसके परिणामस्वरूप जीवन का पर्याप्त नुकसान होता है या मानव पीड़ा या क्षति, और संपत्ति का विनाश, या क्षति, या पर्यावरण का क्षरण होता है तथा वह घटना ऐसी प्रकृति और परिमाण की हो जिस से उभर पाना प्रभावित क्षेत्र के समुदाय की क्षमता से परे हो ।’’

एक कुशल आपदा प्रबंधन प्रणाली द्वारा विभिन्न आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। कम से कम हताहतों की संख्या को कम या शून्य किया जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति ऐसी है कि यहां विभिन्न प्रकार की आपदाओं के घटित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। जैसा-

  1. भारतीय उपमहाद्वीप का लगभग 60 प्रतिशत भू-भाग भूकंप प्रवण क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
  2. भारत विश्व के लगभग 10% चक्रवातों के प्रभाव में आता है।
  3. भारत की लगभग 68% कृषि योग्य भूमि सूखे की चपेट में है।
  4. मानवीय हस्तक्षेप से हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाटों में भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
  5. एक बड़ा क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित है।
  6. शुष्क पर्णपाती और पर्णपाती जंगलों में आग की लगातार घटनाएँ।

भारत में बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं के कारण पर्यावरण में मानवीय हस्तक्षेप में वृद्धि के कारण विभिन्न प्रकार की आपदाओं की आवृत्ति में वृद्धि हुई है। इसलिए, एक कुशल, प्रभावी और मजबूत आपदा प्रबंधन प्रणाली को सक्रिय करना समय की मांग है।

भारत में आपदा को निम्न श्रेणियों में बाँटा गया है- आपदाओं का वर्गीकरण

  • जल एवं जलवायु से जुड़ी आपदाएँ : चक्रवात, बवण्डर एवं तूफान, ओलावृष्टि, बादल फटना, लू व शीतलहर, हिमस्खलन, सूखा, समुद्र-क्षरण, मेघ-गर्जन व बिजली का कड़कना।
  • भूमि संबंधी आपदाएँ : भूस्खलन, भूकंप, बांध का टूटना, खदान में आग।
  • दुर्घटना संबंधी आपदाएँ: जंगलों में आग लगना, शहरों में आग लगना, खदानों में पानी भरना, तेल का फैलाव, प्रमुख इमारतों का ढहना, एक साथ कई बम विस्फोट, बिजली से आग लगना, हवाई, सड़क एवं रेल दुर्घटनाएँ।
  • जैविक आपदाएँ : महामारियॉ, कीटों का हमला, पशुओं की महामारियॉ, जहरीला भोजन।
  • रासायनिक, औद्योगिक एवं परमाणु संबंधी आपदाएं, रासायनिक गैस का रिसाव, परमाणु बम गिरना

स्पष्ट है, आपदा एक ऐसी घटना है जिसका प्रभाव एक बड़े क्षेत्र पर पड़ता है और उन्हें पूरी तरह से रोकना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन इसे निश्चित रूप से प्रबंधित किया जा सकता है। चूँकि विश्व के सभी देश किसी न किसी आपदा से प्रभावित हैं, इसलिए आवश्यक है कि विश्व के सभी देश मिलकर इस दिशा में प्रयास करें। आपदा को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता होगी। इसके अलावा कार्बन उत्सर्जन और पृथ्वी की प्राकृतिक अवशोषण क्षमता के बीच पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करके निश्चित रूप से इस दिशा में अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

 

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Question – Classify disasters. What types of disasters is India most affected by?

Question – Classify disasters. What types of disasters is India most affected by? – 21 July 2021

Answer – Classify Disasters

Disaster means any accident, incident, calamity or grave occurrence in any area caused by natural or man-made causes, or by negligence resulting in substantial loss of life or human suffering or damage, and destruction of property, or damage, or degradation of the environment, and the event is of such a nature and magnitude as to be beyond the capacity of the community of the affected area to recover.

The damage caused by various disasters can be avoided to a great extent by an efficient disaster management system. At least the casualties can be minimized or zero. The geographical and environmental condition of the Indian subcontinent is such that the possibility of occurrence of various types of disasters here cannot be ruled out. as-

  1. About 60 percent of the Indian subcontinent’s land area falls under the earthquake prone zone.
  2. India comes under the influence of about 10% of the world’s cyclones.
  3. About 68% of India’s cultivable land is highly vulnerable to drought.
  4. Human interventions have increased the incidence of landslides in the Himalayan region and the Western Ghats.
  5. A huge area is affected by floods.
  6. Frequent incidents of fire in dry deciduous and deciduous forests.

Due to the needs of the growing population in India, due to increased human intervention in the environment, the frequency of various types of disasters has increased. Therefore, the need of the hour is the activation of an efficient, effective, and robust disaster management system.

Disasters in India are divided into the following categories-

  • Disasters related to water and climate: cyclones, tornadoes and storms, hailstorms, cloudbursts, heat wave and cold wave, avalanche, drought, ocean erosion, cloud-roar and lightning.
  • Land related calamities: landslides, earthquakes, dam break, mine fire.
  • Accidental disasters: forest fires, city fires, mines flooding, oil spills, major building collapses, simultaneous multiple bombings, lightning strikes, air, road and rail accidents.
  • Biological calamities: epidemics, insect attacks, animal epidemics, food poisoning.
  • Chemical, industrial and nuclear related disasters, chemical gas leaks, atomic bomb fall.

It is clear, disaster is such an event that has an impact on a large area and preventing them completely is not an easy task. But it can certainly be managed. Since all the countries in the world are affected by some kind of disaster, so it is necessary that all the countries of the world make efforts in this direction together. International coordination will be required to prevent disaster. Apart from this, by establishing an ecological balance between carbon emissions and the natural absorption capacity of the earth, good results can certainly be achieved in this direction.

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प्रश्न – संसद के प्रति कार्यपालिका की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने में CAG महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है. सविस्तार समझाईये। साथ ही CAG की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु संविधान में वर्णित प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।

प्रश्न – संसद के प्रति कार्यपालिका की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने में CAG महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है. सविस्तार समझाईये। साथ ही CAG की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु संविधान में वर्णित प्रावधानों का उल्लेख कीजिए। – 20 July 2021

उत्तर

संसदीय लोकतंत्र में, कार्यपालिका विधायिका का हिस्सा होती है, और यह अपने कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। वित्तीय जवाबदेही इस जिम्मेदारी का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसे सुनिश्चित करने के लिए भारत के संविधान में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) (अनुच्छेद 148) के लिए एक स्वतंत्र कार्यालय का प्रावधान किया गया है।

  • भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (Comptroller & Auditor General of India-CAG) भारत के संविधान के तहत एक स्वतंत्र प्राधिकरण है।
  • यह भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग (Indian Audit & Accounts Department) का प्रमुख और सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख संरक्षक है।
  • इस संस्था के माध्यम से संसद और राज्य विधानसभाओं के लिये सरकार और अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों (सार्वजनिक धन खर्च करने वाले) की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है और यह जानकारी जनसाधारण को दी जाती है।

वित्तीय उत्तरदायित्व और CAG

  • लोक लेखा समिति संसद की सबसे महत्वपूर्ण स्थायी समितियों में से एक है। समिति का कार्य भारत के नियंत्रक एवंमहालेखा परीक्षक (Comptroller & Auditor General) के वार्षिक लेखा परीक्षण रिपोर्टों की जांच करना है।
  • CAG राष्ट्रपति के समक्ष तीन प्रकार का लेखा परीक्षण/ऑडिट प्रस्तुत करता है- विनियोग खातों पर ऑडिट रिपोर्ट, वित्त खातों पर ऑडिट रिपोर्ट और सार्वजनिक उपक्रमों पर ऑडिट रिपोर्ट।
  • लोक लेखा समिति तकनीकी अनियमितताओं को प्रकट करने के लिए सार्वजनिक व्यय की जांच न केवल विधिक एवं औपचारिक दृष्टिकोण से करती है बल्कि अर्थव्यवस्था, विवेक,तर्कसंगतता एवं प्राधिकार की दृष्टि से भी करता है ताकि अपव्यय, हानि, भ्रष्टाचार, अक्षमता और निरर्थक व्ययों के मामलो को सामने लाया जा सके।
  • अपने कार्यों की पूर्ति में, समिति CAG द्वारा सहायता प्राप्त करती है। वास्तव में, Comptroller & Auditor General समिति के लिए एक मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक के रूप में कार्य करता है।
  • CAG की भूमिका भारत के संविधान और वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में संसद के कानून को बनाए रखना है।
  • वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में संसद के प्रति कार्यपालिका (अर्थात मंत्रिपरिषद) की जवाबदेही CAG की ऑडिट रिपोर्ट के माध्यम से सुरक्षित है।

कैग की स्वायत्तता:

  • CAG की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिये संविधान में कई प्रावधान किये गए हैं।
  • CAG राष्ट्रपति की सील और वारंट द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। ( दोनों में से जो भी पहले हो)
  • CAG को राष्ट्रपति द्वारा केवल संविधान में दर्ज प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के तरीके के समान है।
  • एक बार CAG के पद से सेवानिवृत्त होने/इस्तीफा देने के बाद वह भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी कार्यालय का पदभार नहीं ले सकता।
  • CAG का वेतन और अन्य सेवा शर्तें नियुक्ति के बाद भिन्न (कम) नहीं की जा सकतीं।
  • उसकी प्रशासनिक शक्तियाँ और भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग में सेवारत अधिकारियों की सेवा शर्तें राष्ट्रपति द्वारा उससे परामर्श के बाद ही निर्धारित की जाती हैं।

CAG के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय, जिसमें सभी वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।

 

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Question – CAG plays an important role in ensuring the financial accountability of the Executive towards Parliament. Explain in detail. Also, to ensure the independence of the CAG, mention the provisions mentioned in the constitution.

Question – CAG plays an important role in ensuring the financial accountability of the Executive towards Parliament. Explain in detail. Also, to ensure the independence of the CAG, mention the provisions mentioned in the constitution. – 20 July 2021

Answer – 

In a parliamentary democracy, the executive is part of the legislature, and it is responsible to the legislature for its actions. Financial accountability is an important aspect of this responsibility. To ensure this, provision has been made in the Constitution of India (Article 148) for an independent office for the Comptroller and Auditor General (CAG) of India.

  • The Comptroller and Auditor General of India-CAG is an independent authority under the Constitution of India.
  • It is the head of the Indian Audit and Accounts Department and the principal custodian of the public sector.
  • Through this institution, the accountability of the government and other public authorities (spenders of public money) to the Parliament and state legislatures is ensured and this information is given to the general public.

Financial Responsibility and CAG

  • The Public Accounts Committee is one of the most important standing committees of the Parliament. The function of the committee is to examine the annual audit reports of the Comptroller and Auditor General (CAG) of India.
  • The Comptroller and Auditor General presents three types of audit/audit to the President – Audit Report on Appropriation Accounts, Audit Report on Finance Accounts and Audit Report on Public Undertakings.
  • The Public Accounts Committee examines public expenditure not only from a legal and formal point of view but also from the point of view of economy, prudence, reasonableness and authority to reveal technical irregularities, so as to avoid wastage, loss, corruption, inefficiency and wasteful expenditure. be brought to the fore.
  • In the discharge of its functions, the committee is assisted by the CAG. In fact, the Comptroller and Auditor General acts as a guide, friend and philosopher to the committee.
  • The role of the CAG is to uphold the Constitution of India and the legislation of the Parliament in the field of financial administration.
  • The accountability of the executive (i.e. Council of Ministers) to the Parliament in the area of ​​financial administration is secured through audit reports of the Comptroller and Auditor General.

Autonomy of the CAG:

  • Many provisions have been made in the constitution to protect the independence of the CAG.
  • The CAG is appointed by seal and warrant of the President and has a term of 6 years or till the age of 65 years. (whichever is earlier)
  • The CAG can be removed by the President only in accordance with the procedure laid down in the Constitution which is similar to the manner of removal of a Supreme Court judge.
  • Once retired/resigned from the post of CAG, he cannot hold any office under the Government of India or any State Government.
  • The pay and other service conditions of the CAG cannot be varied (reduced) after appointment.
  • His administrative powers and the conditions of service of officers serving in the Indian Audit and Accounts Department are determined by the President only after consultation with him.
  • The administrative expenses of the office of the CAG, including all salaries, allowances and pensions, are charged on the Consolidated Fund of India which cannot be voted on in Parliament.

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Question – You are a CPIO in a government department. You directly answer the RTI queries or transfer them to the concerned section /division for necessary action. One day, an RTI worker comes to meet you and asks you to give some information which is outside the purview of RTI. When you deny him, he threatens you that he will fill your office with trivial RTI questions and make your life miserable, While you do not pay attention to his threats. But you become more alert now. In a week, the inevitable starts. Each day, you start receiving hundreds of RTI queries, most of which are trivial and arbitrary. However, the refusal of the information being sought by the applicants also takes a lot of time to dispose of. You start to fear that the pendency will continue to increase and you will not be able to address them within the time stipulated in the RTI Act. You start to realize that you have become a victim of RTI terrorism. In this situation, what are your options? Whom would you choose and why? Explain supporting your response.

Question – You are a CPIO in a government department. You directly answer the RTI queries or transfer them to the concerned section /division for necessary action. One day, an RTI worker comes to meet you and asks you to give some information which is outside the purview of RTI. When you deny him, he threatens you that he will fill your office with trivial RTI questions and make your life miserable, While you do not pay attention to his threats. But you become more alert now. In a week, the inevitable starts. Each day, you start receiving hundreds of RTI queries, most of which are trivial and arbitrary. However, the refusal of the information being sought by the applicants also takes a lot of time to dispose of. You start to fear that the pendency will continue to increase and you will not be able to address them within the time stipulated in the RTI Act. You start to realize that you have become a victim of RTI terrorism. In this situation, what are your options? Whom would you choose and why? Explain supporting your response. – 19 July 2021

Answer – 

The main objective of the RTI Act is to promote transparency and accountability in the work of every public authority and to establish a practical administration to provide citizens with access to information that is under the control of public authorities.

Related issue:

With the accountability of the government department, it is a matter of holding government machinery hostage. Intervention is of great importance due to such a pool of trivial questions.

These are the options that are possible:

  • Separate from the talk of the RTI Act, the police complaint about the threatening of the concerned person.
  • To reduce pendency, allocation of increased cases to temporary appointed PIOs within the department to reduce pendency.
  • Let it increase the pendency and ask them to face its response as far as the decision taken by me as CPIO can be justified.

Considering all the options, my action plan as a CPIO would be as follows:

  • I will warn the concerned activist, such as the police complaint that prevents him from requesting trivial questions rather than the actual complaint of intimidation to create fear in his mind.
  • Along with this, I will appoint many PIOs using section 5 of the RTI Act to deal with the increasing questions of the activist and also get time for the actual questions.
  • If the worker continues the same process of sending trivial questions, I will use Section 21 of the RTI Act, which gives CPIOs the right to take action in ‘good faith’ and for this any kind of lawsuit or legal Action cannot be taken.
  • However, providing information cannot be stopped as there is no provision for asking any motive or reason for asking the RTI applicant.
  • Law should be applied in both word and spirit and not just on the words. Public interest is more important than self-interest. The concerned department of government and I as CPIOs will try to prioritize questions based on the public good at large rather than as tools of ‘personal retaliation’ and oppression.

In Jagdish Kumar Koli vs. School Education and Literacy Department, CIC Clearly stated that, “Repeated, disturbing applications cannot be accepted.” This can be prevented in the future by taking the following actions:

  • By amending the RTI, take action on the the ‘Black List’ activists who are constantly involved in trivial questions. And in case of misuse, the fee can be increased with some provision of fine.
  • With the use of computer programs there is a need to increase the use of technology to identify trivial queries and send readymade responses without wasting time and energy of important government resources.
  • Second consideration needs to be given to restrict the number of applications by an applicant within a given time period.

Only 0.6% of RTI applications are condemnable as per the Right to Information and the estimates of advocacy group, but such cases can force the government to bring amendments that have the potential to obstruct the real purpose.People need to maintain faith and courage in this ‘Sunshine Act’ of RTI. It is the responsibility of every stakeholder, including the public at large.

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Question – Critically examine the role of capitalists in the national freedom struggle.

Question – Critically examine the role of capitalists in the national freedom struggle. – 19 July 2021

Answer – 

The capitalists included owners of large trading groups to local traders. The role of the capitalists towards the struggle changed over time.

Role of capitalists in the national freedom struggle:

  • During the Swadeshi movement, the capitalists largely opposed the movement.
  • During the Non-Cooperation Movement, some capitalists supported the movement. But, a section of capitalists, including Purushottam Das, opposed the Non-Cooperation Movement.
  • During the Civil Disobedience Movement, the capitalists largely supported the movement. Yet their contribution to the movement was not enough to make the national movement effective.
  • The capitalists opposed violent mass revolution, because such revolution would pave the way for socialism and this would threaten the existence of capitalism in India.
  • The capitalists were not ready to directly host enmity with the government, as hostility towards the government was not in the interest of the capitalists. Although they provided financial support to the Congress.
  • The Indian capitalists were in favor of constitutional participation, such as the appointment to important positions in executive and legislative councils, as it gave Indians a chance to improve the economy.

Conclusion:

The vacant space created deteriorating control of foreign capital, import substitution by war and change in foreign trade led to the emergence of Indian capitalism. The Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI), an organization of Indian capitalists, made it clear that imperialism is affecting its development in an economic and political way. It was because of this clear criticism of colonialism that Indian capitalists made a policy to participate in the national movement.

 

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प्रश्न – राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में पूंजीपतियों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

प्रश्न – राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में पूंजीपतियों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। – 19 July2021

उत्तर

पूंजीपति वर्ग में बड़े-बड़े व्यापारिक समूहों के मालिकों से लेकर स्थानीय व्यापारी तक शामिल थे।संग्राम के प्रति पूंजीपतियों की भूमिका समय के साथ बदलती रही।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में पूंजीपतियों की भूमिका:

  • स्वदेशी आंदोलन के दौरान, पूंजीपतियों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन का विरोध किया।
  • असहयोग आंदोलन के दौरान, कुछ पूंजीपतियों ने आंदोलन का समर्थन किया। लेकिन, पुरुषोत्तम दास सहितपूंजीपतियों के एक भाग ने असहयोग आंदोलन का विरोध किया था।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान, पूंजीपतियों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन का समर्थन किया। फिर भी आंदोलन में उनका योगदान राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं था।
  • पूंजीपतियों ने जन हिंसक क्रांति का विरोध किया, क्योंकि ऐसी क्रांति समाजवाद के लिए मार्ग प्रशस्त करेगीऔर इससे भारत में पूंजीवाद के अस्तित्व को खतरा होगा।
  • पूंजीपति सरकार से सीधे तौर पर शत्रुता करने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि सरकार से शत्रुता पूंजीपति वर्गके हित में नहीं था। हालांकिउन्होंने कांग्रेस को वित्तीय सहायता प्रदान की थी।
  • भारतीय पूंजीपति, संवैधानिक भागीदारी के पक्ष में थे, जैसे कि कार्यकारी और विधायी परिषदों में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति, क्योंकि इससे भारतीयों को अर्थव्यवस्था में सुधार करने का मौका मिलता था।

निष्कर्ष:

विदेशी पूँजी के अवनतशील नियंत्रण, युद्ध द्वारा आरोपित आयात-प्रतिस्थापन और विदेशी व्यापार में बदलाव की वजह से खाली हुए स्थान पर भारतीय पूंजीवाद का उदय हुआ। भारतीय पूंजीपतियों के वर्ग-संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने निश्चित ढंग से स्पष्ट किया कि साम्राज्यवाद आर्थिक और राजनीतिक तरीके से उसके विकास को प्रभावित कर रहा है। उपनिवेशवाद की इस सुस्पष्ट समीक्षा की वजह से ही भारतीय पूँजीपतियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने की नीति बनायी।

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प्रश्न – आप एक सरकारी विभाग में सीपीआईओ हैं। आप सीधे आरटीआई प्रश्नों का जवाब देते हैं या आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित अनुभाग /मंडल में स्थानांतरित करते हैं। एक दिन, एक आरटीआई कार्यकर्ता आपसे मिलने आता है और आपसे कुछ जानकारी देने के लिए कहता है जो आरटीआई के दायरे से बाहर है। जब आप उसे इनकार करते हैं, तो वह आपको धमकी देता है कि वह आपके कार्यालय को तुच्छ आरटीआई प्रश्नों से भर देगा और आपके जीवन को दुखी कर देगा। जबकि आप उसकी धमकियों पर ध्यान नहीं देते हैं, परन्तु आप अब और सतर्क हो जाते हैं। एक हफ्ते में, अपरिहार्य आरंभ हो जाता है। प्रत्येक दिन, आपको सैकड़ों आरटीआई प्रश्न प्राप्त होने लगते हैं, जिनमें से अधिकांश तुच्छ और मनमाने होते हैं। हालांकि, आवेदकों द्वारा मांगी जा रही जानकारी से इनकार करने पर भी उन्हें निपटाने में बहुत समय लगता है। आप डरने लगते हैं कि पेंडेंसी बढ़ती रहेगी और आप आरटीआई अधिनियम में निर्धारित समय में उन्हें संबोधित नहीं कर पाएंगे। आपको एहसास होने लगता है कि आप आरटीआई आतंकवाद का शिकार हो गए हैं। इस स्थिति में, आपके पास क्या विकल्प हैं? आप किसे चुनेंगे और क्यों? अपनी प्रतिक्रिया को समर्थन करते हुए स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न – आप एक सरकारी विभाग में सीपीआईओ हैं। आप सीधे आरटीआई प्रश्नों का जवाब देते हैं या आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित अनुभाग /मंडल में स्थानांतरित करते हैं। एक दिन, एक आरटीआई कार्यकर्ता आपसे मिलने आता है और आपसे कुछ जानकारी देने के लिए कहता है जो आरटीआई के दायरे से बाहर है। जब आप उसे इनकार करते हैं, तो वह आपको धमकी देता है कि वह आपके कार्यालय को तुच्छ आरटीआई प्रश्नों से भर देगा और आपके जीवन को दुखी कर देगा। जबकि आप उसकी धमकियों पर ध्यान नहीं देते हैं, परन्तु आप अब और सतर्क हो जाते हैं। एक हफ्ते में, अपरिहार्य आरंभ हो जाता है। प्रत्येक दिन, आपको सैकड़ों आरटीआई प्रश्न प्राप्त होने लगते हैं, जिनमें से अधिकांश तुच्छ और मनमाने होते हैं। हालांकि, आवेदकों द्वारा मांगी जा रही जानकारी से इनकार करने पर भी उन्हें निपटाने में बहुत समय लगता है। आप डरने लगते हैं कि पेंडेंसी बढ़ती रहेगी और आप आरटीआई अधिनियम में निर्धारित समय में उन्हें संबोधित नहीं कर पाएंगे। आपको एहसास होने लगता है कि आप आरटीआई आतंकवाद का शिकार हो गए हैं। इस स्थिति में, आपके पास क्या विकल्प हैं? आप किसे चुनेंगे और क्यों? अपनी प्रतिक्रिया को समर्थन करते हुए स्पष्ट कीजिए। – 19 July 2021 

उत्तर – 

आरटीआई अधिनियम का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण के कार्य में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है तथा नागरिकों को उन सूचनाओं तक पहुँच प्रदान करने के लिए एक व्यावहारिक प्रशासन स्थापित करना है, जो सार्वजनिक प्राधिकरणों के नियंत्रण में हैं।

सम्बंधित मुद्देः

सरकारी विभाग की जवाबदेही के साथ, यह सरकारी मशीनरी को बंधक बनाने का मामला है। तुच्छ प्रश्नों के ऐसे पूल के कारण हस्तक्षेप सार्वजनिक महत्व के अन्य वास्तविक प्रश्नों के साथ अन्याय करता है।

ये संभावित विकल्प हैं जो संभव हैं,

  • आरटीआई अधिनियम और डराने-धमकाने के दायरे से बाहर सूचना से संबंधित, संबंधित कार्यकर्ता की धमकी के बारे में पुलिस शिकायत।
  • पेंडेंसी को कम करने हेतु विभाग के भीतर अस्थायी नियुक्त पीआईओ को बढ़े हुए अनुपातहीन मामलों का आवंटन।
  • इसे पेंडेंसी बढ़ाने दें और उनसे इसकी प्रतिक्रिया का सामना करने को कहें जहां तक सीपीआईओ के रूप में मेरे द्वारा लिया गया निर्णय उचित हो सकता है।

सभी विकल्पों पर विचार करते हुए, CPIO के रूप में मेरी कार्य योजना निम्नानुसार होगी:

  • मैं संबंधित कार्यकर्ता को चेतावनी दूंगा जैसे कि पुलिस की शिकायत उसके मन में डर पैदा करने के लिए डराने-धमकाने से वास्तविक शिकायत के बजाय तुच्छ प्रश्नों का अनुरोध करने से रोकता है।
  • इसके साथ ही, मैं कार्यकर्ता के बढ़ते प्रश्नों से निपटने के लिए आरटीआई अधिनियम की धारा 5 का उपयोग कर कई पीआईओ नियुक्त करूँगा और इससे वास्तविक प्रश्नों के लिए समय भी पा सकता हूँ|
  • यदि कार्यकर्ता तुच्छ प्रश्नों को भेजने की एक ही प्रक्रिया जारी रखता है, तो मैं आरटीआईअधिनियम की धारा 21 का उपयोग करूंगा, जो सीपीआईओ को ‘अच्छी आस्था’ में कार्रवाई करने का अधिकार देता है और इसके लिए किसी भी तरह का मुकदमा या कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है।
  • हालाँकि, जानकारी प्रदान करना बंद नहीं किया जा सकता है क्योंकि आरटीआई आवेदक से पूछे जाने का कोई मकसद या कारण पूछने का कोई प्रावधान नहीं है।
  • कानून को शब्द और भावना में लागू किया जाना चाहिए तथा केवल शब्द पर नहीं। जनहित स्वयं के हित से अधिक महत्वपूर्ण है। सरकार का संबंधित विभाग और मैं CPIO के रूप में ‘व्यक्तिगत प्रतिशोध’ और उत्पीड़न के उपकरण के बजाय बड़े पैमाने पर जनता की भलाई के आधार पर प्रश्नों को प्राथमिकता देने की कोशिश करूंगा।

जगदीश कुमार कोली बनाम स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि, “दोहराने, परेशान करने वाले अनुप्रयोगों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।” इसे निम्नलिखित कार्रवाई के द्वारा भविष्य में रोका जा सकता है:

  • आरटीआई में संशोधन से ‘ब्लैक लिस्ट’ कार्यकर्ता पर कार्रवाई करते हैं जो लगातार तुच्छ सवालों में लिप्त रहते हैंऔर दुरुपयोग के मामले में जुर्माने के कुछ प्रावधान के साथ फीस बढ़ाई जा सकती है|
  • कंप्यूटर प्रोग्राम के उपयोग के साथ तुच्छ प्रश्नों की पहचान करने और महत्वपूर्ण सरकारी संसाधनों का समय और ऊर्जा बर्बाद किए बिना रेडीमेड प्रतिक्रिया भेजने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • निश्चित समय अवधि में एक आवेदक द्वारा आवेदन की संख्या को प्रतिबंधित करने के लिए दूसरा विचार देने की आवश्यकता है।

सूचना के अधिकार के अनुसार और अधिवक्ता समूह के अनुमानों के अनुसार आरटीआई के केवल 0.6% आवेदन ही निंदनीय हैं, लेकिन ऐसे मामले सरकार को ऐसे संशोधन लाने के लिए बाध्य कर सकते हैं जिनमें वास्तविक उद्देश्य में बाधा डालने की क्षमता हो। आरटीआई के इस ‘सनशाइन एक्ट’ में लोगों को विश्वास तथा साहस बनाए रखने की जरूरत है। यह बड़े पैमाने पर जनता सहित प्रत्येक हितधारक की जिम्मेदारी है।

 

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प्रश्न – हाल के प्रासंगिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुये , IT एक्ट -2000 की खामियों का वर्णन करें । सोशल मीडिया पर बेहतर और प्रभावकारी नियंत्रण कैसे किए जा सकता है?

प्रश्न – हाल के प्रासंगिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुये , IT एक्ट -2000 (प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000) की खामियों का वर्णन करें । सोशल मीडिया पर बेहतर और प्रभावकारी नियंत्रण कैसे किए जा सकता है? – 17 July 2021

उत्तर – 

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बाद, भारत ने मई 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 पारित किया और 17 अक्टूबर 2000 को अधिसूचना द्वारा इसे लागू किया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 को सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम, 2008 के माध्यम से काफी हद तक संशोधित किया गया है।

अधिनियम के उद्देश्य:

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 निम्नलिखित मुद्दों को को संबोधित करता है:-

  • इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों की कानूनी मान्यता
  • डिजिटल हस्ताक्षर की कानूनी मान्यता
  • अपराध और उल्लंघन
  • साइबर अपराधों के लिए न्याय प्रणाली

सूचना तकनीक क़ानून, 2000 के अंतर्गत साइबरस्पेस में क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधान:

  • कंप्यूटर संसाधनों से छेड़छाड़ का प्रयास
  • कंप्यूटर में संग्रहीत डेटा के साथ छेड़छाड़ कर हैक करने का प्रयास
  • संचार सेवाओं के माध्यम से प्रतिबंधित सूचना भेजने के लिए दंड
  • कंप्यूटर या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से चोरी की गई जानकारी को गलत तरीके से प्राप्त करने के लिए दंड
  • किसी की पहचान चुराने पर जुर्माना
  • किसी की पहचान छुपाकर कंप्यूटर की मदद से व्यक्तिगत डेटा तक पहुंचने के लिए दंड गोपनीयता भंग करने के लिए सजा का प्रावधान
  • साइबर आतंकवाद के लिए सजा का प्रावधान
  • आपत्तिजनक सूचना के प्रकाशन से संबंधित प्रावधान
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सेक्स या अश्लील जानकारी प्रकाशित करने या प्रसारित करने के लिए दंड
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रकाशन या प्रसारण आपत्तिजनक सामग्री जो बच्चों को अश्लील स्थिति में दर्शाती है
  • मध्यस्थों द्वारा इंटरसेप्शन या सूचना को रोकने के लिए दंड
  • सुरक्षित कंप्यूटरों तक अनधिकृत पहुंच से संबंधित प्रावधान
  • डेटा की गलत व्याख्या
  • आपसी विश्वास और गोपनीयता भंग करने से संबंधित प्रावधान
  • अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन में सूचना के प्रकटीकरण से संबंधित प्रावधान
  • नकली डिजिटल हस्ताक्षर का प्रकाशन

अधिनियम की कमियां:

            जबकि अधिनियम साइबरस्पेस में एक नियामक ढांचा स्थापित करने में सफल रहा है, और प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग की कुछ प्रमुख चिंताओं को दूर करता है, लेकिन यह कुछ गंभीर कमियों से ग्रस्त है जिन पर चर्चा नहीं की गई है। सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर अधिकार कार्यकर्ता पवन दुग्गल जैसे कई विशेषज्ञों का तर्क है कि अधिनियम एक दांत रहित कानून है, जो साइबर स्पेस तक पहुंच का दुरुपयोग करने वाले अपराधियों के खिलाफ दंड या प्रतिबंध जारी करने में पूरी तरह से प्रभावी नहीं है। साइबर कानूनों के कुछ क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सुधार हेतु सुझाव:

  • आईटी (संशोधन) अधिनियम, 2008 ने अधिकांश साइबर अपराधों के लिए सजा की मात्रा को कम कर दिया। इसे ठीक करने की जरूरत है।
  • अधिकांश साइबर अपराधों को गैर-जमानती अपराध बनाने की जरूरत है।
  • आईटी अधिनियम मोबाइल फोन के माध्यम से किए गए अधिकांश अपराधों को कवर नहीं करता है। इसे ठीक करने की जरूरत है।
  • इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक डेटा सुरक्षा व्यवस्था को कानून में शामिल करने की आवश्यकता है।
  • व्यक्तियों और संस्थानों की गोपनीयता की रक्षा के लिए आवश्यक विस्तृत कानूनी प्रणाली।
  • साइबर अपराध को अपराध के रूप में आईटी अधिनियम के तहत कवर करने की आवश्यकता है।

आईटी अधिनियम की धारा 66-ए के कुछ हिस्से भारत के संविधान के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों से परे हैं। प्रावधानों को कानूनी रूप से टिकाऊ बनाने के लिए इन्हें हटाने की जरूरत है।

 

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Question – Describe the flaws of the IT Act-2000, citing recent relevant examples. How can better and effective control be put on social media?

Question – Describe the flaws of the IT Act-2000, citing recent relevant examples. How can better and effective control be put on social media? – 17 July 2021

Answer

About IT Act-2000Following the United Nations resolution, India passed the Information Technology Act, 2000 in May 2000 and made it into force by notification on 17 October 2000. The Information Technology Act, 2000 has been substantially amended through the Information Technology Amendment Act, 2008.

Objectives of the Act:

The Information Technology Act 2000 addresses the following issues:-

  • Legal recognition of electronic documents
  • Legal recognition of digital signature
  • offenses and violations
  • Justice system for cyber crimes

Jurisdictional Provisions in Cyberspace under the Information Technology Act, 2000 (IT Act-2000) :

  • Attempt to tamper with computer resources
  • Attempt to hack by tampering with the data stored in the computer
  • Penalty for sending restricted information through communication services
  • Penalty for wrongly obtaining stolen information from computer or any other electronic gadget
  • Penalty for stealing someone’s identity
  • Penalty for accessing personal data with the help of a computer by concealing one’s identity Provision for punishment for breach of privacy
  • Provision of punishment for cyber terrorism
  • Provisions related to publication of objectionable information
  • Penalty for publishing or transmitting sex or obscene information through electronic means
  • Publishing or broadcasting through electronic means objectionable material that depicts children in an obscene state
  • Penalty for interception or withholding of information by arbitrators
  • Provisions relating to unauthorized access to secure computers
  • misrepresentation of data
  • Provisions relating to breach of mutual trust and privacy
  • Provisions relating to disclosure of information in violation of the terms of the contract
  • Publication of fake digital signature

Drawbacks of the Act: IT Act-2000

While the Act has been successful in establishing a regulatory framework in cyberspace, and addresses some of the major concerns of misuse of the technology, it suffers from some serious shortcomings that have not been discussed. Many experts, such as Supreme Court lawyer and cyber rights activist PawanDuggal, argue that the Act is a toothless law, which is not fully effective in issuing penalties or sanctions against criminals who misuse access to cyberspace. There are certain areas of cyber laws that need attention.

Suggestions for improvement of IT Act-2000

  • The IT (Amendment) Act, 2008 reduced the quantum of punishment for majority of cyber crimes. It needs to be rectified.
  • Most cyber crimes need to be made non-bailable offences.
  • The IT Act does not cover most of the offenses committed through mobile phones. It needs to be rectified.
  • A comprehensive data protection regime needs to be incorporated into the law to make it more effective.
  • Detailed legal system necessary to protect the privacy of individuals and institutions.
  • Cyber ​​crime needs to be covered under the IT Act as a crime.

Certain parts of Section 66-A of the IT Act go beyond reasonable restrictions on freedom of speech and expression under the Constitution of India. These need to be removed to make the provisions legally sustainable.

 

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प्रश्न – भारतीय अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट “रोजगार विहीन विकास से नौकरी-नुकसान (Job loss) वृद्धि” में बदलाव को दर्शाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान नौकरी के नुकसान (Job loss) के क्या कारण हैं?

प्रश्न – भारतीय अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट “रोजगार विहीन विकास से नौकरी-नुकसान (Job loss) वृद्धि” में बदलाव को दर्शाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान नौकरी के नुकसान (Job loss) के क्या कारण हैं? – 16 Jul 2021

उत्तर – 

नौकरी-नुकसान की वृद्धि का अर्थ अर्थव्यवस्था में विकास दर के संबंध में नकारात्मक रोजगार लोच है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CIME) ने अपने उपभोक्ता पिरामिड सर्वेक्षणों में जनवरी 2012 और दिसंबर 2018 के दौरान 11 मिलियन की नौकरी के नुकसान और 7.8% की बेरोजगारी दर की सूचना दी। जॉबलेस ग्रोथ जॉब-लॉस ग्रोथ से अलग है क्योंकि पहला रोजगार के अवसरों की धीमी दर से ग्रोथ के साथ ग्रोथ का परिदृश्य है। रोजगार लोच नकारात्मक नहीं है, लेकिन नौकरी-नुकसान की वृद्धि रोजगार में विनाश की स्थिति है जिसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी की वृद्धि हुई है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित एक वर्किंग पेपर के अनुसार, कृषि क्षेत्र ने 2011-12 और 2017-18 के दौरान 4.5 मिलियन प्रति वर्ष (कुल मिलाकर लगभग 27 मिलियन) की दर से रोजगार में गिरावट दर्ज की। कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में रोजगार का हिस्सा 49% से घटकर लगभग 44% हो गया।

श्रम प्रधान विनिर्माण क्षेत्र ने 35 लाख नौकरियों की गिरावट दर्ज की। इस प्रकार कुल रोजगार में विनिर्माण का हिस्सा 12.6 से घटकर 12.1 प्रतिशत हो गया है, – वास्तव में, भारत के इतिहास में पहली बार विनिर्माण नौकरियों में गिरावट आई है। यह न केवल विकास दर में गिरावट है बल्कि पूर्ण संख्या में भी गिरावट है।

देश में वर्तमान नौकरी के नुकसान के कारण

  • श्रम प्रधान क्षेत्र का ठहराव:
  • कुल मिलाकर, अर्थव्यवस्था के 20 उप-क्षेत्रों में से पांच में शुद्ध नौकरी का नुकसान हुआ, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण कृषि और संबद्ध गतिविधियों का प्राथमिक क्षेत्र और खनन और उत्खनन, इसके बाद विनिर्माण के अन्य उत्पादक क्षेत्र हैं।
  • इस प्रकार, अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को कुल नौकरी के नुकसान का 95% हिस्सा नुकसान हुआ। ये 5 उप-क्षेत्र देश में कुल रोजगार का 65% योगदान करते हैं।
  • रोजगार में अपनी उच्च हिस्सेदारी को देखते हुए कृषि, खोई गई नौकरियों की पूर्ण संख्या के मामले में सबसे बड़ी हार के रूप में उभरी है।
  • सरकारी नौकरियों में गिरावट:
  • सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की व्यवस्था ने भी 2011-12 और 2017-18 के दौरान रोजगार में 73 लाख या 4.5 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की है, इस तथ्य को देखते हुए सार्वजनिक सेवा की नौकरियों के इच्छुक शिक्षित युवा निराशा में हैं।
  • कई निम्न-श्रेणी के पदों को हटा दिया गया है और/या उप-अनुबंधित किया गया है। मितव्ययिता उपायों के नाम पर कई रिक्तियां लंबे समय से नहीं भरी गई हैं ।
  • अर्थव्यवस्था का ठहराव: भारतीय अर्थव्यवस्था घटती जीडीपी विकास दर के दौर से गुजर रही है। हाल के आंकड़ों का अनुमान है कि 2019-20 की दूसरी तिमाही में 2 प्रतिशत की वृद्धि दर देखने को मिल सकती है। 2018-19 वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही से अर्थव्यवस्था की मंदी का रोजगार सृजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन: विमुद्रीकरण के नकारात्मक प्रभाव और जीएसटी की शुरुआत से उत्पन्न होने वाले व्यवधान से असंगठित क्षेत्र में शुद्ध नौकरी के नुकसान की स्थिति पैदा हो सकती है जिसे विशेष रूप से श्रमिकों के रोजगार में शुद्ध गिरावट के रूप में देखा जाता है। कृषि, विनिर्माण और कुछ सेवाएं। उदाहरण- पारले ने कम मांग और जीएसटी के प्रतिकूल प्रभाव के कारण 10000 कर्मचारियों की छंटनी की है।
  • शिक्षा और कौशल की आवश्यकता: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नौकरी छूटना ज्यादातर कम शिक्षित लोगों में रहा है। विभिन्न प्रकार की नौकरियों के लिए शैक्षिक योग्यता का दहलीज स्तर जो पहले कम शिक्षितों द्वारा किया जाता था, तकनीकी और संगठनात्मक परिवर्तनों के साथ बढ़ सकता था जो कई आर्थिक गतिविधियों में आए हैं जिसके परिणामस्वरूप नौकरी-हानि वृद्धि हुई है।

इस मुद्दे से निपटने के लिए अर्थव्यवस्था क्या उपाय सकती है-

  1. ग्रामीण ऋण और मांग सृजन के माध्यम से छोटे उद्यमों की उत्पादक क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ प्राकृतिक पूंजी की उत्पादक क्षमता को मजबूत करने और बढ़ाने सहित इसके पुनर्जनन की दृष्टि से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ध्यान दें।
  2. रोजगारपरकता बढ़ाने के लिए विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में शिक्षा, स्वास्थ्य और संबंधित क्षेत्रों को मजबूत करना।
  • स्थिति विशेष रूप से आर्थिक रूप से गरीब वर्गों से महिलाओं के श्रम की छिपी क्षमता का उपयोग करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की भी मांग करती है। संक्षेप में, असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के लोगों के रोजगार और आय की कमी को दूर करने के लिए एक नई रणनीति की आवश्यकता है।
  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करते हुए समग्र मांग की समस्या का समाधान करना।
  2. रोजगार बढ़ाने के लिए औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना।

नौकरी-नुकसान की वृद्धि का देश के जनसांख्यिकीय लाभांश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इसलिए “कृषि परिवर्तन को संबोधित करने, ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी को बढ़ावा देने, औद्योगिक विकास सुनिश्चित करने, कौशल मुद्दों पर विचार” के लिए एक औद्योगिक नीति के साथ एक व्यापक रोजगार नीति की आवश्यकता है ।

 

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Question – The unprecedented drop in the absolute number of workers in the Indian economy reflects a shift from “Jobless growth to job-loss growth”. What are the reasons for the current job losses in the Indian economy?

Question – The unprecedented drop in the absolute number of workers in the Indian economy reflects a shift from “Jobless growth to job-loss growth”. What are the reasons for the current job losses in the Indian economy? – 16 July 2021

Answer –   Job-loss growth implies negative employment elasticity with respect to the growth rate in the economy. The Center for Monitoring Indian Economy (CIME) in its consumer pyramid surveys reported job losses of 11 million and an unemployment rate of 7.8% between January 2012 and December 2018. Jobless growth is different from job-loss growth because the first is a growth scenario with a slower rate of growth of job opportunities. Employment elasticity is not negative, but job-loss growth is a state of destruction in employment, resulting in an increase of unemployment.

According to a working paper published by Azim Premji University, the agriculture sector has registered a decline in employment at the rate of 4.5 million per annum (about 27 million in total) during 2011-12 and 2017-18. The share of employment in agriculture and allied sectors has declined from 49% to about 44%.

The labour-intensive manufacturing sector has registered a drop of 35 lakh jobs. Thus the share of manufacturing in total employment has come down from 12.6 to 12.1 percent. In fact, manufacturing jobs have declined for the first time in India’s history. This is not only a decline in the growth rate, but also a fall in the absolute numbers.

Reasons for loss of current job in the country

  • Stagnation of labor intensive sector:
  • Overall, net job losses occurred in five of the 20 sub-sectors of the economy, the most important of which are the primary sector of agriculture and allied activities and mining and quarrying, followed by other productive sectors of manufacturing.
  • Thus, the productive sectors of the economy accounted for 95% of the total job losses. These 5 sub-sectors contribute to 65% of the total employment in the country.
  • Given its high share of employment, agriculture has emerged as the biggest loser in terms of absolute number of jobs lost.
  • Decline in government jobs:
  • The government/public sector system has also registered a decline in employment to 3.73 lakh or 4.5 per cent during 2011-12 and 2017-18. In view of this fact the educated youth aspiring for public service jobs are in despair.
  • Many low-ranking positions have been removed and/or subcontracted. In the name of austerity measures, many vacancies have not been filled for a long time.
  • Stagnation of Economy: Indian economy is passing through a phase of declining GDP growth rate. Recent data estimates that the second quarter of 2019-20 may see a growth rate of 2 percent. The slowdown in the economy from the last quarter of the 2018-19 financial year had a negative impact on job creation.
  • Structural changes in the economy: The negative impact of demonetisation and the disruption arising from the introduction of GST could lead to net job losses in the unorganized sector, which is seen as a net decline in employment, especially of workers. Agriculture, manufacturing and some services. Example- Parle has laid off 10000 employees due to low demand and adverse effect of GST.
  • Education and Skills Required: It is important to note that, job loss has mostly been among the less educated people. The threshold level of educational qualification for a variety of jobs that were previously performed by the less educated may have increased with the technological and organizational changes that have occurred in many economic activities resulting in increased job-loss.

What measures can the economy take to deal with this issue-

  1. Focus on the rural economy with a view to strengthening the productive capacity of small enterprises through rural credit and demand generation as well as its regeneration including strengthening and enhancing the productive capacity of natural capital.
  2. Strengthening education, health and allied sectors, especially in the rural economy, to increase employability.
  • The situation also calls for a holistic approach to harness the hidden potential of women’s labor especially from the economically poor sections. In short, a new strategy is needed to address the lack of employment and income of people in the unorganized or informal sector.
  1. To address the problem of aggregate demand with focus on rural economy.
  2. To increase production in the industrial sector to increase employment.

Job-loss growth will have an adverse effect on the country’s demographic dividend, hence there is a need for a comprehensive employment policy with an industrial policy to “address agricultural transformation, promote real wages in rural areas, ensure industrial development, consider skill issues”.

 

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प्रश्न – आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण विश्व को नयी प्रकार की चुनौतियाँ सामना करना पड़ेगा , इस संदर्भ मे कारण, चुनौतियों और भारत की भूमिका पर टिप्पणी करें ।

प्रश्न – आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण विश्व को नयी प्रकार की चुनौतियाँ सामना करना पड़ेगा , इस संदर्भ मे कारण, चुनौतियों और भारत की भूमिका पर टिप्पणी करें । – 15 July 2021

उत्तर 

आर्कटिक क्षेत्र में हाल के दशकों में जलवायु परिवर्तन का सबसे नाटकीय प्रभाव देखा जा रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक औसत से दुगनी दर से गर्म हो रहा है। आर्कटिक बर्फ क्षेत्र में लगभग 75% की कमी आई है। जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ समुद्र में पिघलती जा रही है, यह प्रकृति में एक नई वैश्विक चुनौती पैदा कर रही है। दूसरी ओर, यह परिवर्तन उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) को खोल रहा है जो एक छोटे ध्रुवीय चाप के माध्यम से उत्तरी अटलांटिक महासागर को उत्तरी प्रशांत महासागर से जोड़ता है। कई अवलोकन संबंधी अध्ययनों का अनुमान है कि यह मार्ग 2050 की गर्मियों तक या उससे भी पहले बर्फ मुक्त हो सकता है।

आर्कटिक में पिघलती बर्फ का प्रभाव:

वैश्विक जलवायु: आर्कटिक और अंटार्कटिक दुनिया के रेफ्रिजरेटर की तरह काम करते हैं। चूंकि ये क्षेत्र सफेद बर्फ और बर्फ से ढके हुए हैं जो सूर्य से अंतरिक्ष में गर्मी को दर्शाता है (अल्बेडो प्रभाव), वे दुनिया के अन्य हिस्सों में अवशोषित गर्मी के सापेक्ष एक संतुलन प्रदान करते हैं।

  1. बर्फ का कटाव और समुद्री जल का गर्म होना समुद्र के स्तर, लवणता के स्तर, महासागरीय धाराओं और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करेगा।
  2. इसके अलावा, बर्फ क्षेत्र में कमी का मतलब है कि यह गर्मी के प्रतिबिंब को भी कम कर देगा, जिससे दुनिया भर में गर्मी की लहर की तीव्रता में और वृद्धि होगी।
  3. इसका मतलब यह होगा कि ये स्थितियां अधिक चरम सर्दियों को बढ़ावा देंगी क्योंकि जैसे ही ध्रुवीय जेट धारा गर्म हवाओं से अस्थिर हो जाती है, यह अपने साथ गंभीर ठंढ लेकर दक्षिण की ओर बढ़ जाएगी।

तटीय समुदाय: वर्तमान में, औसत वैश्विक समुद्र स्तर 1900 के बाद से 7 से 8 इंच तक बढ़ गया है, और यह स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

  1. समुद्र के बढ़ते स्तर से तटीय शहरों और छोटे द्वीप देशों को अपना अस्तित्व खोने का खतरा है, जिससे तटीय बाढ़ और तूफान बढ़ रहे हैं।
  2. ग्रीनलैंड में हिमनदों का पिघलना भविष्य में समुद्र के स्तर में वृद्धि की एक महत्वपूर्ण चेतावनी है, जिससे यहां के ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाने पर वैश्विक समुद्र स्तर में 20 फीट तक की वृद्धि हो सकती है।

खाद्य सुरक्षा: हिमनद क्षेत्र में गिरावट के कारण ध्रुवीय चक्रवात, गर्मी की लहर की तीव्रता में वृद्धि और मौसम की अनिश्चितता पहले से ही उन फसलों को महत्वपूर्ण नुकसान पहुंचा रही है जिन पर वैश्विक खाद्य प्रणालियां निर्भर हैं। इस अस्थिरता के कारण दुनिया के सबसे कमजोर लोगों के लिए उच्च कीमतों के साथ खाद्य असुरक्षा का संकट जारी रहेगा।

पर्माफ्रॉस्ट और ग्लोबल वार्मिंग: आर्कटिक क्षेत्र में पर्माफ्रॉस्ट के तहत बड़ी मात्रा में मीथेन गैस जमा की जाती है, जो एक ग्रीनहाउस गैस होने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारकों में से एक है।

  1. इस क्षेत्र में बर्फ के पिघलने से मीथेन वातावरण में छोड़ा जाएगा, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की दर में तेजी से वृद्धि होगी।
  2. जितनी जल्दी आर्कटिक का बर्फ क्षेत्र कम होगा, उतनी ही तेजी से पर्माफ्रॉस्ट पिघलेगा और यह दुष्चक्र जलवायु को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।

जैव विविधता के लिए खतरा: आर्कटिक की बर्फ का पिघलना क्षेत्र की जीवंत जैव विविधता के लिए एक गंभीर खतरा है।

  1. प्राकृतिक आवास का नुकसान और क्षरण, साल भर बर्फ की कमी और उच्च तापमान की स्थिति आर्कटिक क्षेत्र के पौधों, पक्षियों और समुद्री जीवन के अस्तित्व के लिए कठिनाइयाँ पैदा कर रही है, जो प्रजातियों को निम्न अक्षांशों से उत्तर की ओर ले जाती है। आपको स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  2. बर्फ के आवरण में गिरावट और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से ध्रुवीय भालू, वालरस, आर्कटिक लोमड़ियों, हिम उल्लू, हिरन और कई अन्य प्रजातियों के लिए समस्याएँ पैदा हो रही हैं।
  3. टुंड्रा का दलदलों में रूपांतरण, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना, तूफान के कारण तटीय क्षति और जंगल की आग से कनाडा और रूस के अंदरूनी हिस्सों में भारी तबाही हुई है।

उत्तरी समुद्री मार्ग (एनएसआर): एनएसआर के माध्यम से आर्कटिक का खुलना पर्याप्त वाणिज्यिक और आर्थिक अवसर प्रस्तुत करता है (विशेषकर शिपिंग, ऊर्जा, मत्स्य पालन और खनिज संसाधनों के क्षेत्रों में)।

  1. इस मार्ग के खुलने से रॉटरडैम (नीदरलैंड) से योकोहामा (जापान) तक की दूरी 40% (स्वेज नहर मार्ग की तुलना में) कम हो जाएगी।
  2. एक अनुमान के अनुसार, दुनिया के 22% अनदेखे नए प्राकृतिक तेल और गैस भंडार आर्कटिक क्षेत्र में हैं, ग्रीनलैंड में अन्य खनिजों के अलावा, दुनिया की 25% दुर्लभ पृथ्वी धातुओं का अनुमान है। ये बहुमूल्य खनिज स्रोत बर्फ के पिघलने के बाद आसानी से उपलब्ध होंगे।

भारत की भूमिका: 

  • भारत के हित: हालांकि इन विकासों के संबंध में भारत के हित बहुत सीमित हैं, वे पूरी तरह से परिधीय या शून्य भी नहीं हैं।
  • भारत की जलवायु: भारत की विस्तृत तटरेखा हमें महासागरीय धाराओं, मौसम के पैटर्न, मत्स्य पालन और हमारे मानसून पर आर्कटिक वार्मिंग के प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • तीसरे ध्रुव की निगरानी: आर्कटिक में होने वाले परिवर्तनों पर वैज्ञानिक शोध, जिसमें भारत का अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड है, तीसरे ध्रुव (हिमालय) में जलवायु परिवर्तन को समझने में मददगार होगा।
  • सामरिक आवश्यकता: आर्कटिक क्षेत्र में चीन की भागीदारी और रूस के साथ बढ़ते आर्थिक और सामरिक संबंधों के रणनीतिक निहितार्थ सर्वविदित हैं, और इसलिए, वर्तमान में व्यापक निगरानी की आवश्यकता है।
  • आवश्यक कदम: आर्कटिक परिषद में भारत को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है, जो आर्कटिक पर्यावरण और विकास के पहलुओं पर सहयोग के लिए प्रमुख अंतर-सरकारी मंच है। वर्तमान में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आर्कटिक परिषद में भारत की उपस्थिति को आर्थिक, पर्यावरणीय, वैज्ञानिक और राजनीतिक पहलुओं को शामिल करते हुए रणनीतिक नीतियों के माध्यम से मजबूत किया जाए।

आर्कटिक वैश्विक जलवायु प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। जिस तरह अमेज़ॅन वर्षावन दुनिया के फेफड़े हैं, आर्कटिक हमारे लिए एक प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करता है, हर क्षेत्र में वैश्विक जलवायु को संतुलित करता है। इसलिए, इसे एक गंभीर वैश्विक मुद्दा मानते हुए आर्कटिक में पिघलती बर्फ से निपटने के लिए मिलकर काम करना मानवता के हित में है।

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Question – The world will face new types of challenges due to the impact of climate change in the Arctic region, Comment on the reasons, challenges and role of India regarding this.

Question – The world will face new types of challenges due to the impact of climate change in the Arctic region, Comment on the reasons, challenges and role of India regarding this. – 15 July 2021

Answer – Impact of Climate Change in the Arctic Region

The Arctic region is witnessing the most dramatic effects of climate change in recent decades, as the region is warming at twice the rate of the global average. The Arctic ice area has decreased by about 75%. As Arctic ice melts into the ocean, it is creating a new global challenge in nature. This change, on the other hand, is opening up the Northern Sea Route (NSR) which connects the North Atlantic Ocean to the North Pacific Ocean via a short polar arc. Several observational studies predict that this route may be ice-free by the summer of 2050 or even earlier.

Effect of melting ice in the Arctic:

Global Climate: The Arctic and Antarctic act like the refrigerators of the world. Since these regions are covered in white snow and ice that reflects heat from the Sun into space (the albedo effect), they provide an equilibrium relative to the heat absorbed in other parts of the globe.

  1. Ice erosion, and warming of seawater will affect sea levels, salinity levels, ocean currents and precipitation patterns.
  2. In addition, the reduction in ice area means that it will also reduce the reflection of heat, which will further increase the intensity of the heat-wave around the world.
  3. This would mean that these conditions would promote more extreme winters because as the polar jet stream destabilized by warmer winds, it would move south bringing with it severe frost.

Coastal communities: Currently, the average global sea level has risen by 7 to 8 inches since 1900, and this situation continues to worsen.

  1. Rising sea levels threaten coastal cities and small island countries to lose their existence, exacerbating coastal flooding and hurricanes.
  2. Glacial melting in Greenland is an important warning of future sea-level rise, which could lead to a global sea level rise of up to 20 feet if the glaciers here completely melt.

Food security: polar cyclones due to the decline in glacial area, increased heat wave intensity and weather uncertainty are already causing significant damage to the crops on which global food systems depend. Due to this instability, the crisis of food insecurity will continue with high prices for the world’s most vulnerable.

Permafrost and Global Warming: A large amount of methane gas is stored under permafrost in the Arctic region, which is a greenhouse gas as well as one of the major factors of climate change.

  1. Due to the melting of ice in this region, methane will be released into the atmosphere, which will lead to a rapid increase in the rate of global warming.
  2. The sooner the Arctic ice area decreases, the faster the permafrost will melt, and this vicious cycle will seriously affect the climate.

Threats to Biodiversity: The melting of Arctic ice poses a serious threat to the vibrant biodiversity of the region.

  1. The loss and degradation of natural habitat, lack of snow throughout the year and high temperature conditions are creating difficulties for the survival of plants, birds and marine life of the arctic region, which drives species north from low latitudes. encourages you to move.
  2. Decline in ice cover and melting of permafrost is causing problems for polar bears, walruses, arctic foxes, snow owls, reindeer and many other species.
  3. The conversion of tundra into swamps, thawing of permafrost, coastal damage caused by storm surges, and forest fires have led to an increase in severe devastation in the interior of Canada and Russia.

Northern Sea Route (NSR): The opening up of the Arctic through the NSR presents substantial commercial and economic opportunities (particularly in the areas of shipping, energy, fisheries and mineral resources).

  1. The opening of this route will cut the distance from Rotterdam (Netherlands) to Yokohama (Japan) by 40% (compared to the Suez Canal route).
  2. By one estimate, 22% of the world’s undiscovered new natural oil and gas reserves are in the Arctic region, with Greenland estimated to contain 25% of the world’s rare earth metals, in addition to other minerals. These valuable mineral sources will be easily accessible after the ice melts.

Role of India:

  • India’s interests: Although India’s interests in relation to these developments are very limited, they are not entirely peripheral or even void.
  • Climate of India: India’s extensive coastline makes us vulnerable to the effects of Arctic warming on ocean currents, weather patterns, fisheries and our monsoons.
  • Monitoring of the Third Pole: Scientific research on changes in the Arctic, in which India has a good track record, will be helpful in understanding climate change in the Third Pole (Himalayas).
  • Strategic need: The strategic implications of China’s engagement in the Arctic region and the growing economic and strategic ties with Russia are well known, and therefore, require extensive monitoring at present.
  • Necessary Steps: India has observer status in the Arctic Council, which is the premier inter-governmental forum for cooperation on aspects of Arctic environment and development. At present it is very important that India’s presence in the Arctic Council be strengthened through strategic policies covering economic, environmental, scientific and political aspects.

Impact of Climate Change in the Arctic Region & Role of India in Climate Change 

The Arctic is an extremely important component of the global climate system. Just as the Amazon rainforest is the lungs of the world, the Arctic serves as a driving force for us, balancing the global climate in every region. Therefore, it is in the interest of humanity to work together to deal with the melting ice in the Arctic, considering it a serious global issue.

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प्रश्न – बढ़ती वनाग्नि की समस्या तथा इसका वैश्विक प्रसार , जलवायु परिवर्तन के खतरों मे अभिवृद्धि कर रहा है , चर्चा करे.

प्रश्न – बढ़ती वनाग्नि की समस्या तथा इसका वैश्विक प्रसार , जलवायु परिवर्तन के खतरों मे अभिवृद्धि कर रहा है , चर्चा करे. – 14 July 2021

उत्तर – बढ़ती वनाग्नि के कारण, प्रभाव और परिवर्तन समस्या 

बढ़ती वनाग्नि के कारण:

  • विश्व भर में देखे जानी वाली वनाग्नि की अधिकांश घटनाएँ मानव निर्मित होती हैं। वनाग्नि के मानव निर्मित कारकों में कृषि हेतु नए खेत तैयार करने के लिये वन क्षेत्र की सफाई, वन क्षेत्र के निकट जलती हुई सिगरेट या कोई अन्य ज्वलनशील वस्तु छोड़ देना आदि शामिल हैं।
  • ब्राजील के अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र के अनुसार, अमेज़ॅन वर्षा वनों में दर्ज की गई 99 प्रतिशत आग मानवीय हस्तक्षेप या आकस्मिक या किसी विशिष्ट उद्देश्य के कारण होती है।
  • जंगल की आग के कुछ प्राकृतिक कारण भी गिनाए जाते हैं, जिनमें बिजली गिरना, पेड़ के सूखे पत्तों के बीच घर्षण, उच्च तापमान, पौधों में सूखापन आदि शामिल हैं।
  • वर्तमान में जंगलों में अत्यधिक मानव अतिक्रमण/हस्तक्षेप के कारण ऐसी घटनाएं अधिक बार देखने को मिल रही हैं। विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियों जैसे पशुओं को चराने, झूम खेती, जंगलों से बिजली के तारों के गुजरने और जंगलों में धूम्रपान करने वाले लोगों आदि के कारण भी ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं।
  • झूम खेती के तहत सबसे पहले पेड़ों और वनस्पतियों को काटा और जलाया जाता है। इसके बाद साफ की गई जमीन को पुराने औजारों (लकड़ी के हल आदि) से जोता जाता है और बीज बो दिए जाते हैं। फसल पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है और उत्पादन बहुत कम है।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क और भूकंप प्रभावों को कम करने के लिए गठबंधन जैसे अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान प्लेटफार्मों जैसे समझौतों के माध्यम से वैश्विक सहयोग का लाभ आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे (सीडीआरआई) पर लगाया जाना चाहिए।

बढ़ती वनाग्नि का प्रभाव:

  1. जंगल की आग से क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा को बहुत नुकसान होता है, भारतीय वन सर्वेक्षण ने जंगल की आग से 440 करोड़ रुपये की वार्षिक वन हानि का अनुमान लगाया है। जंगल की आग के कारण कई जानवर बेघर हो जाते हैं और वे नए स्थानों की तलाश में शहरों में आ जाते हैं।
  2. जंगल की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की भी भारी कमी होती है और उन्हें वापस पाने में भी काफी समय लगता है। जंगल की आग के परिणामस्वरूप मिट्टी की ऊपरी परत में रासायनिक और भौतिक परिवर्तन होते हैं, जिससे भूजल स्तर भी प्रभावित होता है।
  3. यह आदिवासियों और ग्रामीण गरीबों की आजीविका को भी नुकसान पहुंचाता है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 30 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए वन उत्पादों के संग्रह पर सीधे निर्भर हैं।
  4. जंगल की आग को बुझाने के लिए बहुत अधिक आर्थिक और मानव संसाधन की आवश्यकता होती है, जिससे सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।
  5. जंगल की आग से जंगलों पर आधारित नौकरियों और उद्योगों का नुकसान होता है और कई लोगों की आजीविका के साधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा वनों पर आधारित पर्यटन उद्योग को भी काफी नुकसान होता है।
  6. कैलिफोर्निया, ऑस्ट्रेलिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में जंगल की आग के कई मामले देखे गए हैं। ऐतिहासिक रूप से, ये क्षेत्र गर्म और शुष्क जलवायु के लिए जाने जाते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ये क्षेत्र अधिक गर्म और शुष्क हो गए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण इन क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि के साथ-साथ वर्षा में कमी आई है।

वनाग्नि और जलवायु परिवर्तन:

  • वनाग्नि से न सिर्फ क्षेत्र विशेष की संपदा को नुकसान पहुँचता है, बल्कि यह जलवायु को भी प्रभावित करती है। वनाग्नि से कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसों का काफी अधिक मात्रा में उत्सर्जन होता है।
  • इसके अलावा वनाग्नि से वे पेड़-पौधे भी नष्ट हो जाते हैं, जो वातावरण से CO2 को समाप्त करने का कार्य करते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वनाग्नि जलवायु परिवर्तन में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

वनाग्नि संबंधी चुनौतियाँ:

  • विश्व के विभिन्न देशों में, विशेष रूप से भारत में, जंगल की आग से निपटने के लिए उचित नीतियों का अभाव है, जंगल की आग प्रबंधन से संबंधित कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। गौरतलब है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने वर्ष 2017 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने को कहा था, लेकिन अब तक इस पर कोई काम नहीं हुआ है. दिशा।
  • जंगल की आग से निपटने के लिए धन की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
  • आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश जंगल की आग मानव निर्मित होती है, जिसका अनुमान लगाना अपेक्षाकृत कठिन होता है।

आगे की राह:

  • जंगल की आग को जलवायु परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण आयाम मानते हुए इससे निपटने के लिए हमें वैश्विक स्तर पर नीति बनाने की जरूरत है, जो जंगल की आग से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को संबोधित करे।
  • वन अग्नि प्रबंधन के संबंध में कई देशों द्वारा कुछ विशेष मॉडलों का उपयोग किया जा रहा है, यह आवश्यक है कि अन्य देश भी उन्हें तदनुसार बदल दें और उनका उपयोग करें।

जंगल की आग का पता लगाने के लिए रेडियो-ध्वनिक ध्वनि प्रणाली और डॉपलर रडार जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए।

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Question – The problem of increasing wildfires and its global spread is increasing the dangers of climate change, discuss.

Question – The problem of increasing wildfires and its global spread is increasing the dangers of climate change, discuss. – 14 July 2021

Answer – Increasing wildfires & Effect of WildFires on Climate Change

Cause of forest fire:

  • Most of the incidents of forest fires seen around the world are man-made. Man-made factors of forest fire include clearing of forest area to prepare new fields for agriculture, leaving burning cigarette or any other inflammable object near forest area etc.
  • According to the Brazilian Space Research Center, 99 percent of the fires recorded in the Amazon rain forests are caused by human intervention or accidental or for a specific purpose.
  • Some natural causes of forest fires are also counted, which include lightning, friction between dry leaves of trees, high temperature, dryness in plants, etc.
  • Presently such incidents are becoming more frequent due to excessive human encroachment/intervention in the forests. Such incidents have also increased due to various types of human activities like grazing animals, shifting cultivation, passing of electric wires through forests and people smoking in forests etc.
  • Under Jhum cultivation, trees and vegetation are first cut and burnt. The cleared land is then plowed with old tools (wooden plows etc.) and the seeds are sown. The crop is completely dependent on nature and the production is very less.
  • The benefits of global cooperation on disaster resilient infrastructure (CDRI) should be leveraged through agreements such as the Sendai Framework for Disaster Risk Reduction and international knowledge platforms such as the Coalition for Reducing Earthquake Impacts.

Effects of Forest Fire:

  1. Forest fires cause great damage to the natural wealth of the region, with the Forest Survey of India estimating an annual forest loss of Rs 440 crore from forest fires. Due to forest fires many animals become homeless and they migrate to cities in search of new places.
  2. The nutrients present in the soil of the forest are also severely deficient and it also takes a long time to get them back. Forest fires result in chemical and physical changes in the top layer of soil, which also affects the groundwater level.
  3. It also harms the livelihood of tribals and rural poor. According to statistics, about 300 million people in India are directly dependent on the collection of forest products for their livelihood.
  4. Extinguishing forest fires requires a lot of economic and human resources, due to which the government has to suffer a lot.
  5. Forest fires cause loss of jobs and industries based on forests and adversely affect the means of livelihood of many people. Apart from this, the tourism industry based on forests also suffers a lot.
  6. California, Australia and the Mediterranean region have seen several cases of wildfires over the years. Historically, these regions have been known to have hot and dry climates, but due to climate change these regions have become hotter and drier. Climate change has led to an increase in temperature as well as a decrease in rainfall in these regions.

Challenges from forest fire:

  • There is lack of proper policies to deal with forest fires in different countries of the world, especially in India, there are no clear guidelines related to forest fire management. Significantly, in the year 2017, the National Green Authority (NGT) had asked the Ministry of Environment, Forest and Climate Change to formulate a policy in this regard at the national level, but till now no work has been done on it. Direction.
  • Lack of funds to deal with forest fires is also a major challenge.
  • According to statistics, most forest fires are man-made, which is relatively difficult to predict.

Way forward:

  • Considering forest fires as an important dimension of climate change, we need to have a global policy to deal with it, which addresses various important aspects related to forest fires.
  • With some special models being used by many countries regarding forest fire management, it is necessary that other countries also change and use them accordingly.

Modern techniques like radio-acoustic sound system and Doppler radar should be adopted for forest fire detection.

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प्रश्न – दबाव समूह क्या है ? ये भारतीय लोकतंत्र के लिए किस प्रकार से उपयोगी हैं ?

प्रश्न – दबाव समूह क्या है ? ये भारतीय लोकतंत्र के लिए किस प्रकार से उपयोगी हैं ? – 13 July 2021

Answer

दबाव समूह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। ये समूह देश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं ताकि उनके हितों को बढ़ावा मिले या कम से कम उनके हितों की उपेक्षा न हो। भारत जैसे विकासशील देश में जहां एक तरफ विभिन्न संसाधनों की भारी कमी है और दूसरी तरफ अत्यधिक गरीबी और असमानता है, वहां प्रशासनिक व्यवस्था पर बहुत दबाव होना तय है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के दबाव समूहों का जन्म होता है। वे स्थिरता तंत्र प्रदान करते हैं और संरचनात्मक संतुलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।

दबाव समूहों की प्रकृति:

  • भारत जैसे बहुधार्मिक, बहुभाषाई और लोकतांत्रिक देश में दबाव समूहों की प्रकृति उनके विविध लक्ष्यों से निर्धारित होती हैं। कुछ दबाव समूह जाति समूहों के रूप में भी देखे जा सकते हैं, कुछ सामाजिक संरचना पर आधारित दबाव समूह होते हैं, जैसे- अखिल भारतीय दलित महासभा, तमिल संघ आदि।
  • दबाव समूह औपचारिक, संगठित, वृहद और सीमित दोनों ही सदस्यता वाले संगठन होते हैं। लॉबिंग के जरिए यह अपना हित साधने की कोशिश करते हैं। जैसे- फिक्की (FICCI) व एसोचैम(ASSCHAM)।
  • राजनीतिक दलों के विपरीत दबाव समूहों की कार्यप्रणाली किसी विचारधारा अथवा वैचारिक लक्ष्य से संचालित नहीं होती। इनका मूल लक्ष्य हितों का संरक्षण, अभिव्यक्तिकरण, समूहीकरण, सरकार पर दबाव डालना आदि होता है।

दबाव समूहों की कार्यपद्धति:

  • दबाव समूहों की कार्यपद्धति में अपने हितों का प्रचार-प्रसार, संबद्ध लोगों के साथ वार्ताएँ, लाबिंग, न्यायिक कार्यवाहियाँ, प्रदर्शन हड़तालें, याचना, बंद, धरना, पद का प्रस्ताव करना, सरकार व अधिकारियों के साथ बैठकों-गोष्ठियों आदि का उल्लेख किया जा सकता है।
  • दबाव समूह अपनी मांगों को पूरा करने के लिये संबद्ध संस्थाओं व सरकार पर दबाव डालते हैं, मंत्रियों व कर्मचारियों को प्रलोभन देते हैं, चुनावों में राजनीतिक दलों को धन व कार्यकर्ताओं को सुविधाएँ देते हैं। दबाव समूह लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करते हैं।

दबाव समूह की भूमिका:

  • दबाव समूह जनता एवं सरकार के मध्य एक कड़ी एवं संचार का साधन के रूप में कार्य करते हैं तथा लोकतंत्र में व्यापक भागीदारी संभव बनाते हैं।
  • दबाव समूह सामाजिक एकता के प्रतीक हैं क्योंकि ये व्यक्तियों के सामान्य हितों की अभिव्यक्ति के लिये जन साधारण और निर्णय लेने वालों के बीच अंतर को कम करते हैं तथा पूरे समाज में परंपरागत विभाजन को भी कम करने का कार्य करते हैं।
  • दबाव समूह एक संगठित हित समूह है जो अपने-अपने समूह के हितों के पक्ष में सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा राजनीतिक जागरूकता एवं सदस्यों की सहभागिता में वृद्धि करते हैं।

चुनौतियाँ:

  • कभी-कभी ये समूह हित समूह के रूप में राष्ट्रीय एकीकरण के समक्ष खतरे भी उत्पन्न कर देते हैं। जहाँ राजनीतिक सत्ता कमजोर होती है वहाँ अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली दबाव समूह सरकारी मशीनरी को अपनी मुट्ठी में ले सकता है।
  • दबाव समूह सरकारी निर्णयों को केवल अपने समूह के पक्ष में असंतुलित कर सकते हैं और शेष जन समुदाय के अधिकारों का हनन हो सकता है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दबाव समूहों को अब अनिवार्य एवं उपयोगी तत्व माना जाने लगा है। समाज काफी जटिल हो चुका है एवं व्यक्ति अपने हितों को स्वयं आगे नहीं बढ़ा सकता है। ज्यादा से ज्यादा सौदेबाजी की शक्ति प्राप्त करने के लिए उसे अन्य साथियों से समर्थन की आवश्यकता होती है एवं इससे समान हितों पर आधारित दबाव समूहों का जन्म होता है। काफी समय से इन समूहों पर ध्यान नहीं दिया गया लेकिन अब राजनीतिक प्रक्रिया में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो चुकी है क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में परामर्श, समझौते एवं कुछ हद तक सौदे के आधार पर राजनीति चलती है। सरकार के लिए यह अतिआवश्यक है कि वह नीति-निर्माण एवं नीति कार्यान्वयन के समय इन समूहों से संपर्क करें। इसके अलावा सरकार को असंगठित लोगों के विचारों को भी जानना आवश्यक है जो लोग अपनी माँगों को दबाव समूहों के माध्यम से नहीं रख पाते हैं।

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Question – What is a pressure group? How are these useful for Indian democracy ?

Question – What is a pressure group? How are these useful for Indian democracy ? – 13 July 2021

Answer

Pressure groups have become very important to the administrative system. These groups try to influence the administrative and political system of the country so that their interests are promoted or at least their interests are not neglected. In a developing country like India, where there is acute shortage of various resources on one hand and extreme poverty and inequality on the other, there is bound to be a lot of pressure on the administrative system. Different types of pressure groups arise in different walks of life. They provide stability mechanisms and form an important part of structural balance.

Nature of Pressure Groups:

  • In a multi-religious, multilingual and democratic country like India, the nature of pressure groups is determined by their diverse goals. Some pressure groups can also be seen as caste groups, some are pressure groups based on social structure, such as All India Dalit Mahasabha, Tamil Sangh etc.
  • Pressure groups are formal, organized, both large and limited membership organizations. They try to serve their own interests through lobbying. Like- FICCI and ASSOCHAM.
  • Unlike political parties, the functioning of pressure groups is not governed by any ideology or ideological goal. Their basic goal is protection of interests, expression, grouping, putting pressure on the government etc.

Working Method of Pressure Groups:

  • In the working of pressure groups, promotion of their interests, negotiations with the people concerned, lobbying, judicial proceedings, demonstration strikes, solicitation, bandhs, dharnas, proposals of posts, meetings with the government and officials, seminars etc. can be mentioned.
  • Pressure groups pressurize the concerned organizations and the government to meet their demands, wooing ministers and employees, giving money to political parties and facilitating workers in elections. Pressure groups reinforce democratic values and processes.

Role of Pressure Group:

  • Pressure groups act as a link and means of communication between the people and the government and enable wider participation in a democracy.
  • Pressure groups are symbols of social unity as they bridge the gap between the general public and decision-makers for the expression of common interests of individuals and also serve to reduce the traditional divisions in the society as a whole.
  • Pressure groups are organized interest groups that influence government policies in favor of the interests of their respective groups and increase political awareness and participation of members.

Challenges:

  • Sometimes these pressure groups also pose a threat to national integration in the form of interest groups. Where political power is weak, a more powerful pressure group can take over the government machinery.
  • Pressure groups can skew government decisions in favor of only their own group and the rights of the rest of the community may be violated.

Pressure groups are now considered an essential and useful element in the democratic process. The society has become very complex and the individual cannot pursue his own interests. In order to gain maximum bargaining power, it needs support from other peers and this gives rise to pressure groups based on common interests. These groups have not been noticed for a long time, but now their role in the political process has become very important because in a democratic system politics is run on the basis of consultation, agreement and to some extent, bargaining. It is imperative for the government to approach these groups during policy making and policy implementation. Apart from this, the government also needs to know the views of the unorganized people who are unable to put forth their demands through pressure groups.

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Question – Comparatively analyze the views of Mahatma Gandhi and B.R.Ambedkar regarding to the caste system and scheduled castes.

Question – Comparatively analyze the views of Mahatma Gandhi and B.R.Ambedkar regarding to the caste system and scheduled castes. – 12 July 2021

Answer

At the practical level, BhimraoAmbedkar launched a movement within Hinduism for equality between upper-caste Hindus and lower castes, and for this purpose, he took the help of joint feasts, worships, and festivals. His views were different in terms of upliftment of Dalits from that of Gandhi.

Difference in approach of Mahatma Gandhi and B.R Ambedkar:

  • Where Gandhiji believed that untouchability could be eradicated by the change of heart of the upper castes, that is, Mahatma Gandhi was in favor of eradication of the caste system, whereas he didn’t oppose to the varna system. At the same time, Ambedkar believed that the roots of untouchability lie in the Varna system, so to end untouchability, the eradication of Varna system is necessary. As there is no scope for reform in Varna system, it is appropriate to eradicate it completely. Therefore, the upliftment of Dalits is oly possible when their rights are protected, grievance redressal system, and political powers are also conferred to them.
  • Mahatma Gandhi considered the caste system to be a perversion of Hinduism and did not blame Hinduism for the sufferings of Scheduled Castes. Whereas, B. R. Ambedkar renounced Hinduism for the caste system and joined Buddhism with his followers.
  • Mahatma Gandhi used the word ‘Harijan’ for the Scheduled Castes. Whereas Ambedkar used the word ‘Dalit’ for the Scheduled Castes.
  • Mahatma Gandhi focused on socio-economic upliftment of scheduled castes. Whereas, Ambedkar focused not only on the socio-economic upliftment of the Scheduled Castes but also on their political rights.

Conclusion:

Despite the difference in the approaches of Mahatma Gandhi and B.R. Ambedkar in relation to the caste system and the Scheduled Castes, both did unprecedented work in the direction of social reform.

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प्रश्न – जाति व्यवस्था तथा अनुसूचित जातियों के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी और बी.आर.अम्बेडकर के दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिये।

प्रश्न – जाति व्यवस्था तथा अनुसूचित जातियों के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी और बी.आर.अम्बेडकर के दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिये। – 12 July 2021

Answer – जाति व्यवस्था | अनुसूचित जातियों

व्यवहारिक स्तर पर भीमराव अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के भीतर सवर्ण हिन्दुओं और निम्न जातियों के बीच समानता का आन्दोलन चलाया तथा इसके लिए सम्मिलित प्रतिभोज तथा पूजा पर्व का सहारा लिया इनका गाँधी से दलितों के उद्धार के संदर्भ में विचार अलग है।

महात्मा गाँधी और बी.आर.अम्बेडकर के दृष्टिकोण में अंतर:

  • जहाँ गाँधी जी यह मानते थे कि सवर्णों के हृदय परिवर्तन से छुआ-छूत मिटाया जा सकता है, अर्थात् महात्मा गाँधी जाति प्रथा समाप्त करने के समर्थक थे, जबकि वर्ण व्यवस्था से उनका कोई विरोध नहीं था। वहीँ अम्बेडकर का मानना था कि अस्पृश्यता की जड़ें वर्ण व्यवस्था में निहित हैं, अतः अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए वर्ण व्यवस्था का अंत जरूरी है, क्योंकि वर्ण व्यवस्था में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उसे समूल नष्ट कर देना ही उपयुक्त है। अतः दलितों का उद्धार तभी होगा जब अधिकारों की रक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था तथा राजनीतिक सत्ता भी उनके हाथों में आ जाए।
  • महात्मा गाँधी ने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्मं की एक विकृति माना और अनुसूचित जातियों के कष्टों के लिए हिंदू धर्मं को दोष नहीं दिया। जबकि बी. आर. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था के लिए हिंदू धर्मं को त्याग कर अपने अनुयाइयों के साथ बौद्ध धर्म में शामिल हो गए थे।
  • महात्मा गाँधी नेअनुसूचित जातियों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया। जबकि अम्बेडकरने अनुसूचित जातियों के लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग किया।
  • महात्मा गाँधी ने अनुसूचित जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान पर ध्यान

केन्द्रित किया। जबकि अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियोंके न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक उत्थानपर ध्यान दिया, अपितु उनके राजनीतिक अधिकारों पर भी बल दिया।

निष्कर्ष:

जाति व्यवस्था तथा अनुसूचित जातियों के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी और बी.आर.अम्बेडकर के दृष्टिकोण में अंतर के बावजूद दोनों ने समाज सुधार की दिशा में अभूतपूर्व कार्य किए।

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Question – Rampura, a remote district inhabited by a tribal population, is marked by extreme backwardness and abject poverty. Agriculture is the mainstay of the local population, though it is subsistence due to the very small landholdings. There is insignificant industrial or mining activity. Even the targeted welfare programs have inadequately benefited the tribal population. In this restrictive scenario, the youth has begun to migrate to other states to supplement the family income. Plight of minor girls is that their parents are persuaded by labour contractors to send them to work in the BT Cotton farms of a nearby state. The soft fingers of the minor girls are well suited for plucking the cotton. The inadequate living and working conditions in these farms have caused serious health issues for the minor girls. NGOs in the districts of domicile and the cotton farms appear to be compromised and have not effectively espoused the twin issues of child labour and development of the area. You are appointed as the District Collector of Rampura. Identify the ethical issues involved. Which specific steps will you initiate to ameliorate the conditions of minor girls of your district and to improve the overall economic scenario in the district.

Question – Rampura, a remote district inhabited by a tribal population, is marked by extreme backwardness and abject poverty. Agriculture is the mainstay of the local population, though it is subsistence due to the very small landholdings. There is insignificant industrial or mining activity. Even the targeted welfare programs have inadequately benefited the tribal population. In this restrictive scenario, the youth has begun to migrate to other states to supplement the family income. Plight of minor girls is that their parents are persuaded by labour contractors to send them to work in the BT Cotton farms of a nearby state. The soft fingers of the minor girls are well suited for plucking the cotton. The inadequate living and working conditions in these farms have caused serious health issues for the minor girls. NGOs in the districts of domicile and the cotton farms appear to be compromised and have not effectively espoused the twin issues of child labour and development of the area. You are appointed as the District Collector of Rampura. Identify the ethical issues involved. Which specific steps will you initiate to ameliorate the conditions of minor girls of your district and to improve the overall economic scenario in the district. – 11 July 2021

Answer – Rampura remote district inhabited by a tribal population

Ethical issues related to the subject:

  • It is a moral dilemma, in which minor girls struggle with two basic needs – education and good health vs. their socio-economic rights to survive and the livelihood of their families.
  • Also, the case study highlights the issue of working of working girls in BT-Cotton farm which is a direct violation of the Child Labor (Prevention) Act, 2016 and the Right to Education Act, 2009.Under this, the parents of the minor girls and the owner of the BT-Cotton farm can be punished. But this step will be called blind follow of law by ignoring the circumstances in which the crimes like getting minor girls to work.
  • It also highlights the case of the lack of development in the remotest corners of the country and the government’s mistakes in providing welfare schemes.

Steps to improve the condition of minor girls: (Rampura)

  • Apart from violations of Child Labor Law and Right to Education Act, working in BT-cotton farm is also harmful to health as micro-cotton fibers also enter their body in the process of breathing, which increases the risk of respiratory diseases.
  1. Therefore, to prevent minor girls from working in BT-Cotton Farm, there is a need for direct monitoring of the District Collector.
  2. Available funds should be allocated to provide nutrition and education to children.
  • Apart from this there is a need to promote the participation of local communities and civil society by involving them,Lack of manpower should be avoided in welfare initiatives.

Necessary steps to improve the overall economic scenario of the district:

  • The concerned government, states and the Center should seriously consider their immediate support.There is a need to create employment opportunities in this area to solve the problem of migration of youth. For example, youth should be provided with skills with proper training to work in BT cotton fields. This will enable people to live their livelihood without getting involved in crime like child labor.
  • Local people can be prepared to collect micro forest produce with an assured MSP.

Various welfare schemes, the Panchayati Raj Act, 1992 and the provision of Panchayats (Extension of Scheduled Areas), 1996 Act should be followed.

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Question – रामपुरा, एक सुदूर जनजाति बहुल ज़िला, अत्यधिक पिछड़ेपन और दयनीय निर्धनता से ग्रसित है। कृषि स्थानीय आबादी की आजीविका का प्रमुख साधन है लेकिन बहुत छोटे भूस्वामित्व के कारण यह मुख्यतया निर्वाह-खेती तक सीमित है। औद्योगिक या खनन गतिविधियाँ यहाँ नगण्य हैं। यहाँ तक कि लक्षित कल्याणकारी कार्यक्रमों से भी जनजाति आबादी को अपर्याप्त लाभ हुआ है। इस प्रतिबंधित परिदृश्य में, पारिवारिक आय के अनुपूरण हेतु युवाओं को समीप स्थित राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है। अवयस्क लड़कियों की व्यथा यह है कि श्रमिक ठेकेदार उनके माता-पिता को बहला-फुसला कर उन्हें एक नजदीक राज्य में बी.टी. कपास फार्मों में काम करने भेज देते हैं। इन अवयस्क लड़कियों की कोमल अंगुलियाँ कपास चुनने के लिये अधिक उपयुक्त होती हैं। इन फार्मों में रहने और काम करने की अपर्याप्त स्थितियों के कारण अवयस्क लड़कियों के लिये गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो गई हैं। मूल निवास और कपास फार्मों के ज़िलों में स्वयंसेवी संगठन भी निष्प्रभावी लगते हैं और उन्होंने क्षेत्र के बालश्रम और विकास की दोहरी समस्याओं हेतु कोई ठोस प्रयास नहीं किये हैं। आप को रामपुरा का ज़िला कलेक्टर नियुक्त किया जाता है। यहाँ निहित नीतिपरक मुद्दों की पहचान कीजिये। अपने जिले के संपूर्ण आर्थिक परिदृश्य को सुधारने और अवयस्क लड़कियों की स्थितियों में सुधार लाने के लिये आप क्या विशिष्ट कदम उठाएँगे।

Question – रामपुरा, एक सुदूर जनजाति बहुल ज़िला, अत्यधिक पिछड़ेपन और दयनीय निर्धनता से ग्रसित है। कृषि स्थानीय आबादी की आजीविका का प्रमुख साधन है लेकिन बहुत छोटे भूस्वामित्व के कारण यह मुख्यतया निर्वाह-खेती तक सीमित है। औद्योगिक या खनन गतिविधियाँ यहाँ नगण्य हैं। यहाँ तक कि लक्षित कल्याणकारी कार्यक्रमों से भी जनजाति आबादी को अपर्याप्त लाभ हुआ है। इस प्रतिबंधित परिदृश्य में, पारिवारिक आय के अनुपूरण हेतु युवाओं को समीप स्थित राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है। अवयस्क लड़कियों की व्यथा यह है कि श्रमिक ठेकेदार उनके माता-पिता को बहला-फुसला कर उन्हें एक नजदीक राज्य में बी.टी. कपास फार्मों में काम करने भेज देते हैं। इन अवयस्क लड़कियों की कोमल अंगुलियाँ कपास चुनने के लिये अधिक उपयुक्त होती हैं। इन फार्मों में रहने और काम करने की अपर्याप्त स्थितियों के कारण अवयस्क लड़कियों के लिये गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो गई हैं। मूल निवास और कपास फार्मों के ज़िलों में स्वयंसेवी संगठन भी निष्प्रभावी लगते हैं और उन्होंने क्षेत्र के बालश्रम और विकास की दोहरी समस्याओं हेतु कोई ठोस प्रयास नहीं किये हैं।

आप को रामपुरा का ज़िला कलेक्टर नियुक्त किया जाता है। यहाँ निहित नीतिपरक मुद्दों की पहचान कीजिये। अपने जिले के संपूर्ण आर्थिक परिदृश्य को सुधारने और अवयस्क लड़कियों की स्थितियों में सुधार लाने के लिये आप क्या विशिष्ट कदम उठाएँगे। – 11 July 2021

Answer – रामपुरा, एक सुदूर जनजाति बहुल ज़िला

विषय से संबद्द नैतिक मुद्दे:

  • यह एक नैतिक दुविधा है , जिसमें नाबालिग लड़कियों की दो आधारभूत आवश्यकताओं में संघर्ष है- शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य बनाम जीवित रहने के उनके सामाजिक-आर्थिक अधिकार एवं उनके परिवारों की आजीविका।
  • साथ ही केस स्टडी में BT-कॉटन फार्म में कार्यशील नाबालिग लड़कियों से कार्य करवाने के मुद्दे पर प्रकाश डाला गया है, जो बाल श्रम (रोकथाम) अधिनियम, 2016 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। इसके तहत नाबालिग बालिकाओं के माता-पिता और BT-कॉटन फार्म के मालिक को दंडित किया जा सकता है।किंतु यह कदम उन परिस्थितियों की अनदेखी कर कानून का अंधा अनुसरण कहलाएगा, जिनमें नाबालिग बालिकाओं से कार्य करवाने जैसा अपराध हुआ है।
  • साथ ही यह केस एवं देश के दूरस्थ कोने में विकास की कमी तथा कल्याणकारी सेवाएँ प्रदान करने में शासन की विफलता पर भी प्रकाश डालता है।

नाबालिग लड़कियों की स्थिति को सुधारने हेतु कदम:

  • बाल श्रम कानून और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के उल्लंघन के अलावा BT-कॉटन फार्म में काम करना स्वास्थ्य के लिये भी हानिकारक है क्योंकि साँस लेने की प्रक्रिया में सूक्ष्म कपास के रेशे भी उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बना रहता है।
  1. इसलिये BT-कॉटन फार्म में नाबालिग लड़कियों को कार्य करने से रोकने हेतु ज़िला कलेक्टर की प्रत्यक्ष निगरानी की आवश्यकता है।
  2. बच्चों के पोषण और शिक्षा प्रदान करने के लिये उपलब्ध धनराशि को आवंटन किया जाना चाहिये।
  • इसके अलावा स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज की भागीदारी को शामिल कर उन्हें बढ़ावा देने की आवश्यकता है, कल्याणकारी पहल में जनशक्ति की कमी से बचना चाहिये।

ज़िले के समग्र आर्थिक परिदृश्य में सुधार हेतु आवश्यक कदम:

  • संबंधित सरकारों, राज्य और केंद्र को उनके तत्काल समर्थन के लिये गंभीरता से विचार करना चाहिये।
  • युवाओं के प्रवासन की समस्या का समाधान करने के लिये इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसर पैदा करने की आवश्यकता है।उदाहरण के लिये बीटी कॉटन खेतों में काम करने के लिये युवाओं को उचित प्रशिक्षण के साथ कौशल प्रदान किया जाना चाहिये। इससे लोग बाल श्रम जैसे अपराध में शामिल हुए बिना अपनी आजीविका चला सकेंगे।
  • स्थानीय लोगों को एक सुनिश्चित MSP के साथ सूक्ष्म वन उपज इकट्ठा करने के लिये तैयार किया जा सकता है।

विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, पंचायती राज अधिनियम, 1992 एवं पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार), 1996 अधिनियम का पालन करना चाहिये।

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प्रश्न – हाल के प्रासंगिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुये , IT एक्ट -2000 की खामियों का वर्णन करें । सोशल मीडिया पर बेहतर और प्रभावकारी नियंत्रण कैसे किए जा सकता है?

प्रश्न – हाल के प्रासंगिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुये , IT एक्ट -2000 की खामियों का वर्णन करें । सोशल मीडिया पर बेहतर और प्रभावकारी नियंत्रण कैसे किए जा सकता है? – 10 July 2021

Answer

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बाद, भारत ने मई 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 पारित किया और 17 अक्टूबर 2000 को अधिसूचना द्वारा इसे लागू किया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 को सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम, 2008 के माध्यम से काफी हद तक संशोधित किया गया है।

अधिनियम के उद्देश्य:

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 निम्नलिखित मुद्दों को को संबोधित करता है:-

  • इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों की कानूनी मान्यता
  • डिजिटल हस्ताक्षर की कानूनी मान्यता
  • अपराध और उल्लंघन
  • साइबर अपराधों के लिए न्याय प्रणाली

सूचना तकनीक क़ानून, 2000 के अंतर्गत साइबरस्पेस में क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधान:

  • कंप्यूटर संसाधनों से छेड़छाड़ का प्रयास
  • कंप्यूटर में संग्रहीत डेटा के साथ छेड़छाड़ कर हैक करने का प्रयास
  • संचार सेवाओं के माध्यम से प्रतिबंधित सूचना भेजने के लिए दंड
  • कंप्यूटर या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से चोरी की गई जानकारी को गलत तरीके से प्राप्त करने के लिए दंड
  • किसी की पहचान चुराने पर जुर्माना
  • किसी की पहचान छुपाकर कंप्यूटर की मदद से व्यक्तिगत डेटा तक पहुंचने के लिए दंड गोपनीयता भंग करने के लिए सजा का प्रावधान
  • साइबर आतंकवाद के लिए सजा का प्रावधान
  • आपत्तिजनक सूचना के प्रकाशन से संबंधित प्रावधान
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सेक्स या अश्लील जानकारी प्रकाशित करने या प्रसारित करने के लिए दंड
  • इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रकाशन या प्रसारण आपत्तिजनक सामग्री जो बच्चों को अश्लील स्थिति में दर्शाती है
  • मध्यस्थों द्वारा इंटरसेप्शन या सूचना को रोकने के लिए दंड
  • सुरक्षित कंप्यूटरों तक अनधिकृत पहुंच से संबंधित प्रावधान
  • डेटा की गलत व्याख्या
  • आपसी विश्वास और गोपनीयता भंग करने से संबंधित प्रावधान
  • अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन में सूचना के प्रकटीकरण से संबंधित प्रावधान
  • नकली डिजिटल हस्ताक्षर का प्रकाशन

अधिनियम की कमियां:

जबकि अधिनियम साइबरस्पेस में एक नियामक ढांचा स्थापित करने में सफल रहा है, और प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग की कुछ प्रमुख चिंताओं को दूर करता है, लेकिन यह कुछ गंभीर कमियों से ग्रस्त है जिन पर चर्चा नहीं की गई है। सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर अधिकार कार्यकर्ता पवन दुग्गल जैसे कई विशेषज्ञों का तर्क है कि अधिनियम एक दांत रहित कानून है, जो साइबर स्पेस तक पहुंच का दुरुपयोग करने वाले अपराधियों के खिलाफ दंड या प्रतिबंध जारी करने में पूरी तरह से प्रभावी नहीं है। साइबर कानूनों के कुछ क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सुधार हेतु सुझाव:

  • आईटी (संशोधन) अधिनियम, 2008 ने अधिकांश साइबर अपराधों के लिए सजा की मात्रा को कम कर दिया। इसे ठीक करने की जरूरत है।
  • अधिकांश साइबर अपराधों को गैर-जमानती अपराध बनाने की जरूरत है।
  • आईटी अधिनियम मोबाइल फोन के माध्यम से किए गए अधिकांश अपराधों को कवर नहीं करता है। इसे ठीक करने की जरूरत है।
  • इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक डेटा सुरक्षा व्यवस्था को कानून में शामिल करने की आवश्यकता है।
  • व्यक्तियों और संस्थानों की गोपनीयता की रक्षा के लिए आवश्यक विस्तृत कानूनी प्रणाली।
  • साइबर अपराध को अपराध के रूप में आईटी अधिनियम के तहत कवर करने की आवश्यकता है।
  • आईटी अधिनियम की धारा 66-ए के कुछ हिस्से भारत के संविधान के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों से परे हैं। प्रावधानों को कानूनी रूप से टिकाऊ बनाने के लिए इन्हें हटाने की जरूरत है।

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Question – Describe the flaws of the IT Act-2000, citing recent relevant examples. How can better and effective control be put on social media?

Question – Describe the flaws of the IT Act-2000, citing recent relevant examples. How can better and effective control be put on social media? – 10 July 2021

Answer

Following the United Nations resolution, India passed the Information Technology Act, 2000 in May 2000 and made it into force by notification on 17 October 2000. The Information Technology Act, 2000 has been substantially amended through the Information Technology Amendment Act, 2008.

Objectives of the Act:

The Information Technology Act 2000 addresses the following issues:-

  • Legal recognition of electronic documents
  • Legal recognition of digital signature
  • offenses and violations
  • Justice system for cyber crimes

Jurisdictional Provisions in Cyberspace under the Information Technology Act, 2000:

  • Attempt to tamper with computer resources
  • Attempt to hack by tampering with the data stored in the computer
  • Penalty for sending restricted information through communication services
  • Penalty for wrongly obtaining stolen information from computer or any other electronic gadget
  • Penalty for stealing someone’s identity
  • Penalty for accessing personal data with the help of a computer by concealing one’s identity Provision for punishment for breach of privacy
  • Provision of punishment for cyber terrorism
  • Provisions related to publication of objectionable information
  • Penalty for publishing or transmitting sex or obscene information through electronic means
  • Publishing or broadcasting through electronic means objectionable material that depicts children in an obscene state
  • Penalty for interception or withholding of information by arbitrators
  • Provisions relating to unauthorized access to secure computers
  • misrepresentation of data
  • Provisions relating to breach of mutual trust and privacy
  • Provisions relating to disclosure of information in violation of the terms of the contract
  • Publication of fake digital signature

Drawbacks of the Act:

While the Act has been successful in establishing a regulatory framework in cyberspace, and addresses some of the major concerns of misuse of the technology, it suffers from some serious shortcomings that have not been discussed. Many experts, such as Supreme Court lawyer and cyber rights activist Pawan Duggal, argue that the Act is a toothless law, which is not fully effective in issuing penalties or sanctions against criminals who misuse access to cyberspace. There are certain areas of cyber laws that need attention.

Suggestions for improvement:

  • The IT (Amendment) Act, 2008 reduced the quantum of punishment for majority of cyber crimes. It needs to be rectified.
  • Most cyber crimes need to be made non-bailable offences.
  • The IT Act does not cover most of the offenses committed through mobile phones. It needs to be rectified.
  • A comprehensive data protection regime needs to be incorporated into the law to make it more effective.
  • Detailed legal system necessary to protect the privacy of individuals and institutions.
  • Cyber ​​crime needs to be covered under the IT Act as a crime.
  • Certain parts of Section 66-A of the IT Act go beyond reasonable restrictions on freedom of speech and expression under the Constitution of India. These need to be removed to make the provisions legally sustainable.

 

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