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भारत की WTO के सरकारी खरीद समझौते (GPA) में नहीं होगा शामिल

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भारत की WTO के सरकारी खरीद समझौते (GPA) में नहीं होगा शामिल

हाल ही में भारत ने कहा है कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सरकारी खरीद समझौते (GPA) में शामिल होने की उसकी कोई योजना नहीं है ।

  • सरकारी खरीद समझौता (GPA) विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों को सरकारों को वस्तुएं और सेवाएं बेचने के लिए पारस्परिक रूप से अपने बाजार खोलने की अनुमति देता है। सरकारों में प्रायः प्रादेशिक और स्थानीय सरकारें शामिल होती हैं।
  • सरकारी खरीद समझौते (GPA 2012) में 21 पक्षकार शामिल हैं। इसमें WTO के 48 सदस्यों को शामिल करते हुए, यूरोपीय संघ और इसके 27 सदस्य देशों को एक पक्षकार के रूप में गिना जाता है।
  • GPA एक बहुपक्षीय (Plurilateral) समझौता है। इसमें WTO के कुछ सदस्य शामिल हैं लेकिन सभी सदस्य नहीं।
  • सरकारी एजेंसियों को अक्सर सार्वजनिक संसाधनों के साथ और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए वस्तुएं और सेवाएं खरीदने की आवश्यकता होती है। ऐसी खरीद को आम तौर पर ‘सार्वजनिक खरीद के रूप में जाना जाता है।
  • सरकारी खरीद औसतन एक अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद का 10-15% होती है। यह एक महत्वपूर्ण बाजार का निर्माण करती है और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
  • इससे पहले, भारत ने घरेलू कंपनियों की सुरक्षा के लिए द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यापार समझौतों में कभी भी सरकारी खरीद समझौते को शामिल नहीं किया है।
  • हालांकि, हाल ही में भारत ने कहा है कि वह द्विपक्षीय सौदों के हिस्से के रूप में सरकारी खरीद पर वार्ता करने के लिए तैयार है।
  • हाल ही में, पहली बार संयुक्त अरब अमीरात के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते में सरकारी खरीद को शामिल किया गया है।
  • भारत-संयुक्त अरब अमीरात व्यापार समझौते के तहत भी, सरकारी खरीद केवल कुछ केंद्रीय मंत्रालयों तक ही सीमित है। इसमें विनिर्माण, अवसंरचना परियोजनाओं और स्वास्थ्य देखभाल जैसे प्रमुख क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया है

सरकारी खरीद समझौते-2012 (GPA 2012) में शामिल होने से निम्नलिखित महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समझौते में शामिल किए गए विदेशी खरीद बाजारों में कानूनी रूप से सुनिश्चित पहुंच के आधार पर संभावित व्यापार लाभ प्राप्त होते हैं।
  • संकट के समय में (जब संरक्षणवाद को बढ़ावा मिलता है) यह बाजारों को खुला रखता है।
  • सरकारी खरीद प्रणाली में जनता, आपूर्तिकर्ता और निवेशकों के विश्वास में बढ़ोतरी होती है। इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अन्तर्वाह को प्रोत्साहन मिलता है।
  • समझौतों के लिए प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी होती है। इससे खर्च किये गए धन के बदले बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।

स्रोत –द हिन्दू

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