IBBI के प्रमुख ने एक व्यापक सीमा पार इन्सॉल्वेंसी ढांचे पर दिया बल
भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (BBI) के नए प्रमुख ने एक व्यापक सीमा पार इन्सॉल्वेंसी ढांचे पर बल दिया है ।
सीमा-पार इन्सॉल्वेंसी उन परिस्थितियों को दर्शाती है, जिसमें एक दिवालिया देनदार (ऋणी) की एक से अधिक देशों में परिसंपत्तियां या लेनदार होते हैं।
- वर्तमान में, इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 के प्रावधान, द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से सीमा पार इन्सॉल्वेंसी के मामलों का निपटान करते हैं। इसके लिए निर्णायक प्राधिकरण, IBC की धारा 234 और धारा 235 के तहत विदेशी अदालतों को अनुरोध पत्र जारी करते हैं।
- इन्सॉल्वेंसी लॉ कमिटी (ILC) ने यह पाया है कि, यह प्रक्रिया एक तदर्थ (एड-हॉक) ढांचा है । इसके चलते लेनदारों, देनदारों और अदालतों को देरी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
- इसके परिणामस्वरूप, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने IBC के तहत सीमा पार इन्सॉल्वेंसी के लिए कानूनी उपाय का एक प्रस्ताव रखा है। हालांकि, इसे अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
सीमा पार इन्सॉल्वेंसी ढांचे का महत्वः
- यह सीमा पार दिवालियापन की कार्यवाही के लिए एक मजबूत व सिद्धांत-आधारित ढांचा प्रदान करेगा। इसके द्वारा भारतीय और विदेशी हितधारक, अपनी समस्याओं को तेजी एवं कुशलता से हल करने में सक्षम होंगे।
- इसे वैश्विक निवेशकों और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं द्वारा एक प्रगतिशील और दूरदर्शिता आधारित बाजार सुधार के रूप में देखा जाएगा।
- इसके द्वारा भारतीय कार्यवाहियों की पहुँच और मान्यता उन अधिकार क्षेत्रों में सुगम होगी, जो पहले से ही ऐसे मॉडल कानून को अपना चुके हैं।
- भारतीय व्यवसायों द्वारा विश्व में अपने कारोबार के विस्तार और वित्तीय बाजार से संबंधों में वृद्धि के कारण इसकी आवश्यकता महसूस की गई है।
स्रोत –द हिन्दू