वर्ष 2100 तक वनाग्नि में 50% की वृद्धि होगी

वर्ष 2100 तक वनाग्नि में 50% की वृद्धि होगी

हाल ही में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2100 तक वनाग्नि में 50% की वृद्धि होगी, लेकिन इससे निपटने के लिए सरकारें तैयार नहीं हैं ।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और ग्रिड–अरेन्डल (GRID-Arendal) ने स्प्रेडिंग लाइक वाइल्डफायरः द राइजिंग थेट ऑफ एक्स्ट्राऑर्डिनरी लैंडस्केप फायरशीर्षक से एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है।

इस रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन तथा भू–उपयोग परिवर्तन वनाग्नि की घटनाओं को और गंभीर बना रहे हैं। साथ ही, इस रिपोर्ट में पहले अप्रभावित रहे क्षेत्रों में भी वनाग्नि की चरम घटनाएं होने तथा इन घटनाओं में वैश्विक वृद्धि की आशंका जताई गयी है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

वनाग्नि की प्रवृत्ति में बदलावः

  • जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग एवं भूमि प्रबंधन प्रथाओं में परिवर्तन, वनाग्नि के प्रसार, तीव्रता, अवधि व सीमा को प्रभावित कर रहे हैं।
  • आर्कटिक, उष्णकटिबंधीय वन (इंडोनेशिया और दक्षिणी अमेजन), उष्णकटिबंधीय सवाना आदि जैसे क्षेत्रों में वनाग्नि की घटनाएं बार-बार होंगी।
  • वनाग्नि की घटनाओं में वर्ष 2030 तक 14% तक और वर्ष 2100 तक 52% तक वृद्धि होने का अनुमान है।
  • संयुक्त राष्ट्र सतत विकास एजेंडा 2030 के लिए वैश्विक वनाग्नि जोखिम को कम करना एक आवश्यक घटक है। यह आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क और पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापन पर संयुक्त राष्ट्र दशक के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी आवश्यक है।

प्रभाव

वैश्विक कार्बन चक्र पर प्रभावः पीटभूमि और वर्षावन जैसे पारिस्थितिक तंत्र स्थलीय कार्बन के विशाल भंडार के रूप में कार्य करते हैं। ऐसे पारिस्थितिक तंत्र में आग लगने से वायुमंडल में बड़ी मात्रा में CO2 उत्सर्जित होती है। इससे भूमंडलीय तापन में बढ़ोतरी होगी।

व्यक्तियों, समुदायों और राष्ट्रों पर इसके गंभीर आर्थिक प्रभाव होंगे।

स्वास्थ्य पर प्रभावः दहन से उत्पन्न धुएँ के कण और विषैले उत्पाद श्वसन प्रणाली को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही, हृदय वाहिनियों को भी प्रभावित करते हैं और तंत्रिका संबंधी विकारों के जोखिम को भी बढ़ाते हैं।

वनाग्नि वन्यजीव मृत्यु दर में वृद्धि व मृदा अपरदन का कारण बनती है। साथ ही, जलग्रहण क्षेत्र की कार्यप्रणाली को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

सिफारिशें

  • वनाग्नि की व्यापकता और प्रवृत्ति पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पहचानने व उसके अनुरूप प्रतिक्रिया करने की जरूरत हैं।
  • वनाग्नि की प्रवृत्ति को समझना चाहिए साथ ही, ईंधन प्रबंधन और वनाग्नि की निगरानी प्रणाली में सुधार किया जाना चाहिए।
  • वनाग्नि से निपटने की नीतियों में स्वदेशी, पारंपरिक और समकालीन अग्नि प्रबंधन प्रथाओं का एकीकरण एवं समर्थन करने की जरूरत है।
  • वनाग्नि पर अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता है।
  • वनाग्नि के शमन और प्रबंधन हेतु प्रतिक्रियाशील शमन उपायों पर व्यय करके निवेश को संतुलित किया जाना चाहिए।
  • समुदायों और स्थानीय अधिकारियों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।

स्रोत –द हिन्दू

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