हाई सी संधि

हाई सी संधि            

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र ने “राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता” (BBNJ) के संरक्षण और सतत उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए हाई सी संधि को अपनाया।

1994 और 1995 की संधियों के बाद, यह UNCLOS के तहत अनुमोदित होने वाला तीसरा समझौता बन गया, जिसने अंतर्राष्ट्रीय सीबेड प्राधिकरण और फिश स्टॉक्स समझौते की स्थापना की।

हाई सी क्या है ?

हाई सी पर 1958 के जेनेवा अभिसमय के अनुसार, समुद्र के वे हिस्से जो प्रादेशिक जल या किसी देश के आंतरिक जल में शामिल नहीं हैं, हाई सी के रूप में जाने जाते हैं।

हाई सी संधि  के प्रावधान

संधि का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे महासागरों में जीवन की रक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियमों को लागू करना है।

इसके तहत  समुद्र की सतह के बढ़ते तापमान, समुद्री जैव विविधता का अत्यधिक दोहन, अत्यधिक मछली पकड़ना, तटीय प्रदूषण और राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे अपोषणीय कार्यो जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करना है।

सर्वप्रथम “तीन चौथाई  बहुमत वोट” के माध्यम से महासागरों को मानवीय गतिविधियों से बचाने के लिए समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना करना है, जो निर्णय को एक या दो पार्टियों द्वारा अवरुद्ध होने से रोकता है।

समुद्री आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों के उचित बंटवारे पर यह संधि ‘स्वच्छ गृह तंत्र’ स्थापित करके वैज्ञानिक जानकारी और मौद्रिक लाभों को साझा करने का आदेश देती है।

‘स्वच्छ गृह  तंत्र’ के माध्यम से समुद्री संरक्षित क्षेत्रों, समुद्री आनुवंशिक संसाधनों और क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण की जानकारी सभी पक्षों के लिए उपलब्ध होगी। यह पारदर्शिता लाने और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने वाली होगी।

संधि का अंतिम स्तंभ क्षमता निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकी है।

वैज्ञानिक और तकनीकी निकाय’ पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह संस्था मूल्यांकन प्रक्रियाओं के लिए मानक और दिशानिर्देश तैयार करेगी और कम क्षमता वाले देशों का मूल्यांकन करने में मदद करेगी।

इससे भविष्य के प्रभावों का पता लगाने, डेटा अंतराल की पहचान करने और अनुसंधान प्राथमिकताओं को सामने लाने के लिए कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज  को सुविधा मिलेगी।

पृष्ठभूमि –

समुद्री पर्यावरण के सुरक्षा  का विचार 2002 में सामने आया।

2008 तक, एक समझौते को लागू करने की आवश्यकता को पहचाना गया, जिसके कारण 2015 में UNGA ने संधि बनाने के लिए एक  समिति बनाने का प्रस्ताव रखा।

समिति ने अंतर सरकारी सम्मेलन (IGC) आयोजित करने की सिफारिश की और पांच लंबी IGC वार्ताओं के बाद, संधि को 2023 में अपनाया गया।

संधि के लागू होने में इतना समय क्यों लगा –

समुद्री आनुवंशिक संसाधनों का मुद्दा संधि का सबसे विवादित तत्व था।

संधि के सभी पक्षों  तक खुली पहुंच सुनिश्चित करने के लिए समुद्री संरक्षित क्षेत्रों और तकनीकी, वैज्ञानिक एवं क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरणों पर जानकारी साझा करना मुख्य मुद्दा था।

सूचना साझा करने की निगरानी के प्रावधान के अभाव के कारण इस विषय पर बातचीत लंबी चली।

IGC-2 में, छोटे द्वीप राज्यों ने निगरानी के लिए एक लाइसेंसिंग योजना के विचार का समर्थन किया, लेकिन अमेरिका और रूस जैसे देशों ने इसका विरोध किया, यह कहते हुए कि इसकी अधिसूचना प्रणाली “बायोप्रोस्पेक्टिंग अनुसंधान” में बाधा बनेगी।

संधि का विरोध करने वाले देश –

कई विकसित देशों ने इस संधि का विरोध किया क्योंकि वे निजी संस्थाओं के साथ खड़े हैं जो समुद्री प्रौद्योगिकी में उन्नत अनुसंधान और विकास में सबसे आगे हैं । अधिकांश पेटेंट भी निजी कंपनियों के एक छोटे समूह के पास है।

रूस और चीन भी इस संधि के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि उनके अनुसार यह संधि संरक्षण और संपोषणीय विकास को संतुलित नहीं करती है ।

स्रोत – आई.डी.एस.ए.

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