संसद के सदस्यों (MPs) के विशेषाधिकार और शक्तियां

संसद के सदस्यों (MPs) के विशेषाधिकार और शक्तियां

राज्य सभा में विपक्ष के नेता ने अपने भाषण के कुछ हिस्सों को हटाए जाने का विरोध किया है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-105 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि, सांसदों को भाषण देने व बोलने की स्वतंत्रता है।

  • अनुच्छेद-105, संसद के सदनों और इसके सदस्यों व समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों आदि से संबंधित है।
  • ये शक्तियां और विशेषाधिकार इनके कार्यों के निर्वहन में स्वतंत्रता एवं प्रभावशीलता को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हैं।
  • इन विशेषाधिकारों के बिना, सदन न तो अपने प्राधिकार, गरिमा और सम्मान को बनाए रख सकते हैं तथा न ही अपने सदस्यों को उनकी संसदीय जिम्मेदारियों के निर्वहन में किसी प्रकार की बाधा से सुरक्षित रख सकते हैं ।

संसदीय विशेषाधिकारों को दो व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • प्रथम श्रेणी के विशेषाधिकार प्रत्येक सदन को सामूहिक रूप से प्राप्त हैं, जबकि दूसरी श्रेणी के विशेषाधिकार सदन के सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त हैं।
  • संसद ने सभी विशेषाधिकारों को व्यापक रूप से संहिताबद्ध करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं बनाया है ।
  • ये विशेषाधिकार उन व्यक्तियों को भी प्रदान किए जाते हैं, जो संसद की किसी भी समिति में भाग लेते हैं और बोलते हैं। इनमें भारत के महान्यायवादी और केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं।
  • हालांकि, संसदीय विशेषाधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त नहीं हैं ।
  • सुप्रीम कोर्ट ने तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी (1970) और पी. वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998) मामलों में अनुच्छेद 105 के तहत प्रदान की गई सुरक्षा को व्यापक दायरा प्रदान किया है।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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