नाबालिगों पर वयस्कों के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं

नाबालिगों पर वयस्कों के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं

हाल ही में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने “नाबालिगों पर वयस्कों के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं” इसके आकलन के लिए दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार किया है।

  • ये दिशा-निर्देश बरुण चंद्र ठाकुर बनाम मास्टर भोलू के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश के अनुपालन में बनाए गए हैं।
  • दिशा-निर्देशों का मसौदा, किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 15 के तहत प्रारंभिक आकलन (निर्धारण) करने के लिए तैयार किया गया है।
  • पहले, 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्तियों को नाबालिग माना जाता था ।
  • वर्ष 2015 में इसमें संशोधन करके एक प्रावधान जोड़ा गया। नए प्रावधान के तहत जघन्य अपराधों के मामले में आरोपी 16-18 वर्ष के आयु वर्ग के बालकों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है।
  • यह निर्धारित करने के लिए कि ऐसे बालकों पर वयस्क या नाबालिग की तरह मुकदमा चलाया जाए, किशोर न्याय बोर्ड (JJB) उनका शारीरिक और मानसिक परीक्षण करता है ।

मसौदा दिशा-निर्देशों की मुख्य विशेषताएं

  • सामान्य सिद्धांत : किशोर न्याय बोर्ड और अन्य विशेषज्ञों को देखभाल और सुरक्षा के मौलिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
  • इनमें बेगुनाही की पूर्व – धारणा, सर्वोत्तम हित, सुरक्षा, प्राकृतिक (नैसर्गिक) न्याय आदि सिद्धांत शामिल होते हैं ।
  • बेगुनाही की पूर्व-धारणा (Presumption of innocence) का अर्थ है कि किसी अपराध के आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाए जब तक कि वह दोषी साबित नहीं हो जाता।
  • प्रारंभिक आकलन उद्देश्य : आयु और चार अन्य निर्धारक तत्वों का निर्धारण करना।
  • चार निर्धारक तत्व हैं– बालक की शारीरिक क्षमता, मानसिक क्षमता, परिस्थितियां और कथित अपराध के दुष्परिणामों को समझने की क्षमता ।
  • JJB की भूमिका: आकलन की पूरी जिम्मेदारी इस संस्था के पास होगी। साथ ही, यह बाल मनोवैज्ञानिकों या मनो-सामाजिक कार्यकर्ताओं से सहायता ले सकता है।
  • प्रारंभिक आकलन का समापन : यह तीन महीने की अवधि के भीतर होना चाहिए ।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)

  • NCPCR का गठन मार्च 2007 में ‘कमीशंस फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स’ (Commissions for Protection of Child Rights- CPCR) अधिनियम, 2005 के तहत एक वैधानिक निकाय के रूप में किया गया है।
  • यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्यरत है।
  • आयोग का अधिदेश (mandate) यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानून, नीतियाँ, कार्यक्रम और प्रशासनिक तंत्र भारत के संविधान में निहित बाल अधिकार के प्रावधानों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के बाल अधिकारों के अनुरूप भी हों।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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