रूस चीन सहयोग चिंता का विषय
हाल ही में अलबर्टा के कोल्ड लेक सैन्य अड्डे के दौरे पर गए नाटो महासचिव ने आर्कटिक में रूस और चीन के सहयोग पर चिंता प्रकट की है।
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) महासचिव ने कहा है कि आर्कटिक में रूस-चीन सहयोग चिंता का विषय है।
वर्ष 2014 में रूस ने एक नई आर्कटिक कमान गठित की थी। इसने सैकड़ों नए और पूर्व सोवियत-युग के आर्कटिक सैन्य अड्डे पुनः खोल दिए हैं। इनमें कुछ हवाई क्षेत्र और गहरे जल वाले पत्तन शामिल हैं।
वर्ष 2018 में चीन ने स्वयं को ‘निकट-आर्कटिक देश घोषित कर दिया था। चीन की इस घोषणा का उद्देश्य आर्कटिक के तेल, गैस, खनिज आदि का दोहन करना है। इसके लिए उसने इस क्षेत्र में शिपिंग, अनुसंधान और अन्वेषण परियोजनाओं में रुचि दिखाना शुरू कर दिया है।
चीन ने ध्रुवीय सिल्क रोड बनाने में भी रुचि दिखाई है। यह वास्तव में आर्कटिक वृत्त से होकर उत्तरी अमेरिका, पूर्वी एशिया और पश्चिमी यूरोप को जोड़ने वाला आर्कटिक नौवहन मार्ग है।
आर्कटिक परिषद् के बारे में
- यह पृथ्वी का सबसे उत्तरी क्षेत्र है। इसमें आर्कटिक वृत्त के भीतर के क्षेत्र शामिल हैं। आर्कटिक वृत्त भूमध्य रेखा से 66.5° उत्तर में अक्षांश की एक रेखा है।
- इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के राज्यक्षेत्र शामिल हैं। ये सभी देश आर्कटिक परिषद में शामिल हैं। इसकी स्थापना वर्ष 1996 में उपर्युक्त आठ आर्कटिक देशों ने ओटावा घोषणा-पत्र के माध्यम से की थी।
- भारत आर्कटिक परिषद में एक गैर-आर्कटिक पर्यवेक्षक देश के रूप में शामिल है ।
स्रोत –द हिन्दू
