‘भूस्खलन’ एक आपदा

भूस्खलन एक आपदा

हाल ही में,मणिपुर भूस्खलन में मरने वालों की संख्या बढ़कर 29 हो गई है। बारिश की वजह से बचाव में बाधा आ रही है।

भूस्खलन को ढलान से चट्टान, मलबे, या मृदा के व्यापक पैमाने पर नीचे खिसकने के रूप में परिभाषित किया जाता है।

भारतीय भूभाग का लगभग 12.6 प्रतिशत भाग भूस्खलन संभावित क्षेत्र है।

भूस्खलन संभावित विशिष्ट क्षेत्र:

  • हिमालयः प्लेट विवर्तनिकी गति आदि के कारण उच्च भूकंपीय गतिविधि के कारण, और
  • पश्चिमी घाट: एक ही जगह अधिक वर्षा, पहाड़ियों पर अधिक दबाव आदि के कारण।

भूस्खलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • भूवैज्ञानिकः कमजोर या खंडित भू-भाग या चट्टान,
  • भू-आकृतिः ऐसी ढलानें, जहां आग लगने या सूखे की वजह से वनस्पति नष्ट हो चुकी है, वे भूस्खलन के प्रति अधिक सुभेद्य हैं,
  • मानव गतिविधियां: वनों की कटाई, खनन आदि ।

भूस्खलन को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम –

  • भूस्खलन पूर्व-चेतावनी प्रणाली (LEWS): लैंडस्लिप परियोजना के तहत भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) के उपयोग से चेतावनी दी जाती है।
  • देश के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) द्वारा भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया गया है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने भूस्खलन जोखिम क्षेत्र (Landslide Hazard Zonation) के लिए दिशा-निर्देश तैयार किये हैं।

भूस्खलन को नियंत्रित करने के उपाय-

  • सामुदायिक भूमि में वनावरण में वृद्धि आवश्यक है।
  • आकस्मिक बाढ़ के प्रभाव को कम करने और भूजल स्तर के पुनर्भरण के लिए जलग्रहण क्षेत्रों में अतिरिक्त जल संचित करना चाहिए। जानवरों द्वारा वनस्पति के चरने को सीमित किया जाना चाहिए।
  • शहरीकरण से जुड़ी गतिविधियों (जैसे बांधों या अन्य वाणिज्यिक परियोजनाओं का निर्माण) को कम करने की जरूरत है।

भूस्खलन का प्रभाव

  • यह लोगों की आवाजाही को प्रतिबंधित करता है। साथ ही, राजमार्ग और रेलवे लाइनों पर यातायात बाधित हो जाता है।
  • मानव जीवन और अवसंरचना का नुकसान होता है।
  • जनता के पुनर्वास के लिए अवसंरचना के पुनर्निर्माण हेतु वित्तीय बोझ का कारण बनता है।
  • बाढ़ के खतरे को बढ़ाता है।

स्रोत –द हिन्दू

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