भारतीय वस्त्र निर्यातकों की चुनौतियाँ बढ़ीं
हाल ही में ,भारतीय वस्त्र निर्यातकों को बांग्लादेश और वियतनाम द्वारा प्रतिस्थापित होने की आशंका बढ़ गई है ।
प्रतिस्पर्धी देशों के समक्ष भारत द्वारा बाजार लोप का कारणः
- कपास और सूती धागे के अन्य देशों को अनियंत्रित निर्यात से कच्चे माल के रूप में इन मदों की स्थानीय आपूर्ति में गिरावट तथा इनकी कीमतों में वृद्धि हो रही है।
- विगत छह महीनों में भारत के कपास और सूती धागे के निर्यात में 56 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि वैश्विक बाजारों में परिधान व्यापार में केवल 24 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है।
- कपास की कीमतों में 30 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक का तीव्र वर्धन हुआ है।
- इसके अतिरिक्त, बजट घोषणा में आयातित कपास पर 10% शुल्क आरोपित करने से उत्पादन की लागत में भी वृद्धि हुई है।
- भारतीय वस्त्र उद्योग खंडित है और इसमें असंगठित क्षेत्र का प्रभुत्व है। इसमेंशामिल लघु एवं मध्यम स्तर के उद्योग अप्रचलित प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहे हैं। अनम्य श्रम कानून विद्यमान हैं।
- भारत में परिधान इकाइयों का औसत आकार 100 मशीनों का है, जो बांग्लादेश की तुलना में बहुत ही कम है, वहाँ प्रति कारखाना औसतन 500 मशीनें हैं।
- विदेशी निवेश का अभाव है।
- बांग्लादेश, चीन के उपरांत दूसरा सबसे बड़ा परिधान निर्यातक बन गया है। विगत आठ वर्षों में वियतनाम के वस्त्र-निर्यात में लगभग 240% की वृद्धि दर्ज की गई है।
हाल में आरंभ की गई पहलेः
- प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (Technology Up-gradation Fund Scheme: TUFS)
- एकीकृत टेक्सटाइलपार्क योजना (Scheme for Integrated Textile Parks: SITP)
- वस्त्र उद्योग के लिए संशोधित प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना(Amended Technology Upgradation Fund Scheme: ATUFS)
- तकनीकी वस्त्र प्रौद्योगिकी मिशन (Technology Mission for Technical Textiles: TMTI)
- एकीकृत प्रसंस्करण विकास योजना (Integrated Processing Development Scheme: IPDS)
स्रोत –द हिन्दू