भारतीय मानसून की प्रकृति और उत्पत्ति और इसकी भविष्यवाणी की हाल की तकनीक

Questionभारतीय मानसून की प्रकृति और उत्पत्ति और इसकी भविष्यवाणी की हाल की तकनीकों पर चर्चा कीजिए। – 30 November 2021

उत्तर

मानसून से तात्पर्य

  • ध्यातव्य है कि यह अरबी शब्द मौसिम से निकला हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है हवाओं का मिज़ाज।
  • शीत ऋतु में हवाएँ उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं जिसे शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है। उधर, ग्रीष्म ऋतु में हवाएँ इसके विपरीत दिशा में बहती हैं, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है।
  • चूँकि पूर्व के समय में इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी, इसीलिये इन्हें व्यापारिक हवाएँ या ‘ट्रेड विंड’ भी कहा जाता है।

मानसून की उत्पत्ति

  • ग्रीष्म ऋतु में जब हिंद महासागर में सूर्य विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होता है, तो मानसून का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में समुद्र की सतह गरम होने लगती है और उसका तापमान 30 डिग्री तक पहुँच जाता है। जबकि इस दौरान धरती का तापमान 45-46 डिग्री तक पहुँच चुका होता है।
  • ऐसी स्थिति में हिंद महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएँ सक्रिय हो जाती हैं। ये हवाएँ एक दूसरे को आपस में काटते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की तरफ बढ़ने लगती है। इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
  • विषुवत रेखा पार करके ये हवाएँ और बादल वर्षा करते हुए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का रुख करते हैं। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों का तापमान समुद्र तल के तापमान से अधिक हो जाता है।
  • ऐसी स्थिति में हवाएँ समुद्र से सतह की ओर बहना शुरू कर देती हैं। ये हवाएँ समुद्री जल के वाष्पन से उत्पन्न जल वाष्प को सोख लेती हैं और पृथ्वी पर आते ही ऊपर की ओर उठने लगती है और वर्षा करती हुई आगे बढ़ती हैं।
  • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में पहुँचने के बाद ये मानसूनी हवाएँ दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं।
  • एक शाखा अरब सागर की तरफ से मुंबई, गुजरात एवं राजस्थान होते हुए आगे बढ़ती है तो दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी से पश्चिम बंगाल, बिहार, पूर्वोत्तर होते हुए हिमालय से टकराकर गंगीय क्षेत्रों की ओर मुड़ जाती हैं और इस प्रकार जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में अत्यधिक वर्षा होने लगती है।

मानसून का पूर्वानुमान

भारतीय मानसून की घटना देश के सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इसकी भविष्यवाणी बहुत महत्वपूर्ण रही है। आईएमडी वर्षों से मानसून की भविष्यवाणी करने के लिए प्रतिगमन मॉडल का उपयोग कर रहा है। लेकिन हाल ही में मानसून की भविष्यवाणी करने के लिए एक गतिशील मॉडल विकसित किया गया है। इस मॉडल में, विभिन्न मेट्रोलॉजिकल स्टेशन से प्राप्त डेटा को एक विशेष समय सीमा में एक्सट्रपलेशन करने के लिए सिमुलेशन का उपयोग किया जाता है। लेकिन फिर भी तकनीक पूर्ण प्रमाण नहीं है और इसलिए आईएमडी दोनों मॉडलों से पूर्वानुमान प्रदान कर रहा है और मानसून के लिए एक युग्मित मॉडल पूर्वानुमान का उपयोग कर रहा है।

  • वस्तुतः मानसून एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसका अनुमान लगाना बेहद जटिल है। कारण यह है कि भारत में विभिन्न किस्म के जलवायु जोन और उप-जोन हैं। हमारे देश में 127 कृषि जलवायु उप-संभाग हैं और 36 संभाग हैं।
  • मानसून विभाग द्वारा अप्रैल के मध्य में मानसून को लेकर दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया जाता है। इसके बाद फिर मध्यम अवधि और लघु अवधि के पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। हालाँकि पिछले कुछ समय से ‘नाऊ कास्ट’ के माध्यम से मौसम विभाग ने अब कुछ घंटे पहले के मौसम की भविष्यवाणी करना आरंभ कर दिया है।
  • ध्यातव्य है कि मौसम विभाग की भविष्यवाणियों में हाल के वर्षों में सुधार देखा गया है। अभी मध्यम अवधि की भविष्यवाणियाँ जो 15 दिन से एक महीने की होती हैं, 70-80 फीसदी तक सटीक निकलती है।
  • हालाँकि, लघु अवधि की भविष्यवाणियाँ जो आगामी 24 घंटों के लिये होती हैं करीब 90 फीसदी तक सही होती हैं। अलबत्ता, नाऊ कास्ट की भविष्यवाणियाँ करीब-करीब 99 फीसदी सही निकलती हैं।

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