बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स जीवों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना

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बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स जीवों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना

बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स जीवों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना

  • हाल ही में नासा (NASA) बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स (Baby Squids and Tardigrades) नामक जीवों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) में भेजने की योजना बना रहा है। इन जीवों के अन्तरिक्ष में पहुँचने से विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में मदद मिलेगी।
  • बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स जीवों को पानी के भालू (वाटर बियर) के रूप में भी जाना जाता है। ये जीव पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे जटिल संरचना वाले लचीले जीवों में से एक हैं।
  • टार्डिग्रेड 8 पैरों वाला होता है, और भालू की तरह दिखता है तथा इसके शरीर में 4 खंड होते हैं। टार्डिग्रेड को केवल माइक्रोस्कोप की सहायता से ही देखा जा सकता है क्योंकि यह मात्र आधा मिलीमीटर लंबा है।

स्पेसफ्लाइट के वातावरण में ‘टार्डिग्रेड्स’ का व्यवहार

  • विदित हो कि ‘टार्डिग्रेड’ पृथ्वी पर उच्च दबाव, तापमान और विकिरण जैसी जटिल परिस्थितियों में अपने आप को जीवित रख सकते हैं।

अध्ययन का महत्त्व:

  1. होस्ट-सूक्ष्मजीव संबंध:
  • पृथ्वी पर यह जानवरों और लाभकारी रोगाणुओं के बीच जटिल संबंधों को बचाने और यहाँ तक ​​कि बेहतर मानव स्वास्थ्य तथा कल्याण सुनिश्चित करने के तरीके खोजने में मदद करेगा।
  • यह अंतरिक्ष एजेंसियों की लंबी अवधि के मिशनों पर पड़ने वाले प्रतिकूल होस्ट-सूक्ष्मजीव परिवर्तनों से अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा का बेहतर उपाय विकसित करने में मदद करेगा।
  1. लंबी अंतरिक्ष उड़ानें:
  • टार्डिग्रेड्स पर अध्ययन करने से वैज्ञानिको को उनकी कठोरता को निकट से अध्ययन करने और संभवतः उन जीनों की पहचान करने का मौका मिलेगा जो इन्हें अत्यधिक लचीला बनाते हैं। इस तरह के अध्ययन सुरक्षित तथा लंबी अंतरिक्ष उड़ानों में मदद करेंगे ।
  • ज़ेब्राफिश (Zebrafish) पर हाल ही में इसी तरह के एक शोध ने प्रदर्शित किया कि कैसे प्रेरित ‘शीतनिद्रा’ अंतरिक्ष उड़ान के दौरान अंतरिक्ष के तत्त्वों, विशेषकर विकिरण से मनुष्यों की सुरक्षा कर सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

  • पृथ्वी की ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ में स्थित यह मानव निर्मित एक कृत्रिम उपग्रह है। इस उपग्रह पर मानव भी रह सकता है। इसे वर्ष 1998 में ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ में लॉन्च किया गया था।
  • यह पृथ्वी का एक चक्कर लगभग 92 मिनट में लगाता है। इस प्रकार यह प्रतिदिन पृथ्वी की 15.5 परिक्रमाएँ पूरी करता है।
  • इस ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ कार्यक्रम को 5 देशों की प्रतिभागी अंतरिक्ष एजेंसियों ने संयुक्त परियोजना के तौर पर निर्मित किया है। ये प्रमुख पाँच अन्तरिक्ष एजेंसी निम्न है: नासा (अमेरिका), रॉसकॉसमॉस (रूस), जाक्सा (जापान), ESA (यूरोप) और CSA (कनाडा)।
  • इस स्टेशन के स्वामित्व और उपयोग को अंतर-सरकारी संधियों और समझौतों के माध्यम से शासित किया जाता है।
  • यह एक एक प्रकार से अंतरिक्ष में पर्यावरण अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है। इसमें चालक दल के सदस्य जीव विज्ञान, मानव जीव विज्ञान, भौतिकी, खगोल विज्ञान, मौसम विज्ञान और अन्य विषयों से संबंधित प्रयोग करते हैं।
  • इसके स्टेशन के वर्ष 2030 तक संचालित रहने की उम्मीद है। कुछ दिन पहले चीन ने अपने स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन का एक मानव रहित मॉड्यूल लॉन्च किया, जिसे वर्ष 2022 के अंत तक पूरा करने की उसकी योजना है।
  • ‘तियानहे’ या ‘हॉर्मनी ऑफ द हैवन्स’ नामक इस मॉड्यूल को चीन के सबसे बड़े मालवाहक रॉकेट लॉन्ग मार्च 5 बी से लॉन्च किया गया है।
  • भारत भी भविष्य में 5 से 7 वर्षों में अंतरिक्ष में सूक्ष्म गुरुत्त्व संबंधी प्रयोगों का संचालन करने के लिये ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ में अपने स्वयं के अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।

स्रोत :द हिन्दू

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