बारहमासी चावल की किस्म का विकास

बारहमासी चावल की किस्म का विकास

हाल ही में चीन ने PR23 नामक चावल की किस्म विकसित की है।

इसे हर साल रोपने की जरूरत नहीं है, मजबूत जड़ों वाले इसके पौधे प्रत्येक कटाई के बाद स्वतः तेजी से उग आते हैं। यह किस्म चार वर्षों में लगातार आठ उपज दे सकती है।

बारहमासी चावल की किस्म के प्रमुख लाभ

  • इसकी खेती के लिए श्रम, बीज और रासायनिक उर्वरकों पर बहुत कम खर्च होता है। इस प्रकार यह कृषि की लागत को कम करती है। श्रम की लागत में 58% और अन्य संसाधनों की लागत में 49% की बचत होती है।
  • इसके पर्यावरणीय लाभ भी अधिक हैं। ऐसी किस्मों की खेती से मृदा में एक टन जैविक कार्बन (प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष) जमा हो जाता है। इसके अलावा, पौधे के लिए जल की उपलब्धता में भी वृद्धि होती है।
  • खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आय पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।

मुख्य चिंताएं:

  • नियमित तौर पर उगाए जाने वाली चावल की किस्मों की तुलना में बारहमासी किस्म की खेती के लिए एक से अधिक बार शाकनाशी उपाय करने की जरुरत पड़ती है।
  • जब बारहमासी किस्म किसी वजह से उपज नहीं दे पाती है, तो इसे फिर से बोने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ते हैं।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने भी एक शाकनाशी सहिष्णु चावल की किस्म विकसित की थी। इसे मृदा में सीधे बोया जा सकता है। इससे जल और कृषि श्रमिकों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है।

भारत में चावल की खेती:

  • भारत, चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। भारत, विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश भी है।
  • यह खरीफ की फसल है।
  • इसकी खेती के लिए उच्च तापमान ( 25°C से ऊपर), उच्च आर्द्रता और अधिक वर्षा (100 सेमी से ज्यादा) की आवश्यकता होती है।
  • इसकी खेती के लिए जलोढ़ दोमट मृदा सबसे अनुकूल है, जिसकी जल धारण क्षमता अधिक होती है।

स्रोत – द हिन्दू

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