प्रश्न – हाल ही में चर्चा का विषय रहा स्पेस इंटरनेट और स्टारलिंक परियोजना क्या है? आपके अनुसार इसकी आवश्यकता क्यों है तथा इसके समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या है? विश्लेषण करें ।

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प्रश्न – हाल ही में चर्चा का विषय रहा स्पेस इंटरनेट और स्टारलिंक परियोजना क्या है? आपके अनुसार इसकी आवश्यकता क्यों है तथा इसके समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या है? विश्लेषण करें । – 5 June 2021                                                      

उत्तर

  • स्पेस एक्स नामक निजी कंपनी ने स्पेस इंटरनेट की सुविधा प्रदान कराने के लिये पृथ्वी की निचली कक्षा अर्थात् लोअर अर्थ ऑर्बिट (Lower Earth Orbit-LEO) में कुल 42,000 उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिये स्टारलिंक नामक परियोजना (Starlink Project) की शुरुआत वर्ष 2015 में की थी। इस परियोजना के अंतर्गत उपग्रहों का इस प्रकार प्रक्षेपण किया जाएगा जिससे पृथ्वी के चारों ओर एक उपग्रह तारामंडल (Satellite Constellation) का निर्माण हो जाए ।
  • पृथ्वी पर ये उपग्रह ट्रांसिवरों (Transceivers) की मदद से कार्य करेंगे। इसके अलावा स्पेस एक्स इस उपग्रह तारामंडल (SatelliteConstellation) के कुछ उपग्रहों को सैन्य, वैज्ञानिक तथा खनन जैसे उद्देश्यों की पूर्ति के लिये बेचने की योजना भी बना रही है।
  • स्पेस इंटरनेट से तात्पर्य है अंतरिक्ष के माध्यम से विश्व में इंटरनेट की सेवाएँ उपलब्ध कराना अर्थात अंतरिक्ष में उपग्रहों के प्रक्षेपण द्वारा इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराना है।
  • ज्ञात हो कि वर्तमान में जो इंटरनेट सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, वे मूलतः समुद्र के नीचे बिछे हज़ारों किलोमीटर लंबे ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पर आधारित हैं। इसमें समस्या यह है कि समुद्र के नीचे होने के कारण इसे बिछाने तथा रखरखाव में काफी खर्च आता है, साथ ही इन केबल्स के समुद्र तल पर बिछे होने के कारण इन्हें अक्सर समुद्री तूफानों, भूकंप, तीव्र ज्वार,भूस्खलन तथा मछली पकड़ने वाले जहाजों का सामना करना पड़ता है, जिससे ये क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
  • वर्तमान में स्पेस इंटरनेट की उपलब्धता सीमित होने के कारण इस सेवा का उपयोग केवल कुछ देशों की सरकारी संस्थाओं तथा लोगों द्वारा ही किया जा रहा है। इस स्पेस इंटरनेट सेवा की उपलब्धता पृथ्वी की भू-स्थैतिक कक्षा (Geostationary Orbit-GEO) में प्रक्षेपित किये जाने वाले उपग्रहों के माध्यम से की जा रही है जिसकी पहुँच सीमित स्तर पर है।
  • GTO कक्षा में स्थित उपग्रहों द्वारा डेटा भेजने एवं प्राप्त करने में लगने वाला समय जिसे तकनीकी भाषा में लेटेंसी’ कहते हैं, लोअर अर्थ ऑर्बिट (LEO) की अपेक्षा अधिक होता है जिससे रियल टाइम में इंटरनेट डेटा ट्रांसिव नहीं हो पाता है। जबकि वहीं पृथ्वी की निचली कक्षा में (LEO) प्रक्षेपित किये जाने वाले उपग्रहों द्वारा डेटा प्राप्त करने और भेजने में अत्यंत कम समय, लगभग 20 मिली सेकेंड लगेंगे जिसे आगे चलकर आधा किया जा सकेगा। इससे लगभग रियल टाइम में इंटरनेट डाटा ट्रांसिव हो पाएगा, लेकिन इसके लिये अधिक संख्या में उपग्रहों की भी आवश्यकता होगी।

आवश्यकता क्यों?

  • वर्तमान में विश्व की तकरीबन 4 बिलियन जनसंख्या जो विश्व की आधी जनसंख्या से भी अधिक है, के पास इंटरनेट की पहुँच नहीं के बराबर है।
  • जब दूर-संवेदी क्षेत्र, जैसे- पहाड़ी क्षेत्रों तथा अन्य असुविधा युक्त क्षेत्रों में ऑप्टिकल फाइबर, केबल और वायरलेस जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से इंटरनेट की पहुँच की सुविधा उपलब्ध करा पाना संभव नहीं हो पा रहा हो, ऐसी स्थिति में उक्त सभी प्रकार की चुनौतियों से निपटने के लिये स्पेस इंटरनेट एक प्रभावी विकल्प हो सकता है।
  • इस इंटरनेट प्रणाली के इस्तेमाल से दूर-संवेदी क्षेत्रों में भी अबाधित रूप से इंटरनेट की पहुँच की सुनिश्चितता हो सकेगी। इसके अलावा केबलऔर ऑप्टिकल फाइबर द्वारा पहुँचाए जाने वाले इंटरनेट की तुलना में कम लागत में इंटरनेट की सुविधा की पहुँच भी सुनिश्चित हो पाएगी।
  • स्पेस इंटरनेट के उपयोग से केबल और ऑप्टिकल फाइबर के महँगे रखरखाव के खर्च से भी बचा जा सकेगा।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • लोअर अर्थ ऑर्बिट में इतनी संख्या में उपग्रहों को स्थापित करने से अन्तरिक्ष कचरे की समस्या उत्पन्न होगी ।

यह ‘केसलर सिंड्रोम’ की अवस्था को जन्म देगा।

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