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प्रश्न – जैव ईंधन समुदायों के लिए व्यापक पर्यावरणीय, सामाजिक-आर्थिक और स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने में सक्षम है। इस कथन के संदर्भ में, भारत में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ाने से जुड़ी संभावनाओं और इसकी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करें।

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प्रश्न – जैव ईंधन समुदायों के लिए व्यापक पर्यावरणीय, सामाजिक-आर्थिक और स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने में सक्षम है। इस कथन के संदर्भ में, भारत में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ाने से जुड़ी संभावनाओं और इसकी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करें। – 17 April 

उत्तर – 

जैव ईंधन कम समय में कार्बनिक पदार्थ से उत्पादित किया जाने वाला हाइड्रोकार्बन ईंधन है। यह जीवाश्म ईंधन से भिन्न होता है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन के बनने में लाखों-करोड़ों वर्ष लग जाते हैं।  जैव ईंधन को ऊर्जा का नवीकरणीय रूप माना जाता है और इसमें जीवाश्म ईंधन की तुलना में ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम होता है।

यह जैव ईंधन (इथेनॉल, बायोडीजल और संपीड़ित बायो-गैस) भारत के ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक उपकरण के रूप में उभरा है। यह आयातित कच्चे तेल और पर्यावरण प्रदूषण पर निर्भरता को कम करने के साथ-साथ किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्रदान करने में सहायक हो सकता है।

जैसे-जैसे हमारा देश टिकाऊ ऊर्जा संसाधनों की ओर बढ़ रहा है, इसकी विभिन्न आवश्यकताओं के बीच समन्वय स्थापित करना एक कठिन चुनौती बनती जा रही है। इन समस्याओं में आयातित ऊर्जा पर निर्भरता को कम करना, किफायती बिजली खर्च को बनाए रखने के दौरान ग्रिड को हरित ऊर्जा से जोड़ना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, ऊर्जा उत्पादन के पुराने तरीकों को बदलना और बहुत कुछ शामिल हैं।

ऊर्जा सुरक्षा और जैव-ईंधन:

  1. आयातित तेल की मात्रा में कमी:वर्तमान में, भारत अपनी ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए देश में खनिज तेल और गैस की कुल मांग का सबसे अधिक अन्य देशों से आयात करता है। जैव ईंधन के साथ खनिज तेल की कुछ मात्रा को प्रतिस्थापित करने से आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। वर्तमान में, पेट्रोल में इथेनॉल सम्मिश्रण 2022 तक 10% और 2030 तक 20% होने का लक्ष्य है, जो वाहनों से उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगा।
  2. ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत :खनिज तेल के विपरीत, जो एक अक्षय संसाधन है, जैव ईंधन अक्षय स्रोतों से उत्पादित होते हैं। ऐसी स्थिति में, सैद्धांतिक रूप से अनंत काल तक जैव ईंधनों के उत्पादन और उपयोग को स्थायी रूप से जारी रखा जा सकता है।

पर्यावरण सुरक्षा और जैव-ईंधन:  

वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना: विभिन्न अपशिष्ट जैवभार स्रोतों से ‘संपीड़ित जैव-गैस’ (Compressed Bio-Gas-CBG) उत्पादन के हेतु एक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थापना करने के लिये, अक्तूबर 2018 में ‘किफायती परिवहन के लिये टिकाऊ विकल्प’ या ‘सतत’ (Sustainable Alternative towards Affordable Transportation-SATAT) नामक योजना की प्रारंभकी गई थी।

  • “सतत” योजना न केवल ग्रीनहॉउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने में सहायक होगी, बल्कि यह कृषि क्षेत्र में फसलों के अवशेषों (जैसे-पराली) आदि के दहन की घटनाओं को कम करने में सहायक होगी।
  • ‘संपीड़ित जैव-गैस’ संयंत्रों से निकलने वाले उप- उत्पाद में से एक जैव खाद है, जिसका उपयोग खेती में किया जा सकता है।
  • साथ ही यह ग्रामीण और अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों का विकास करने के साथ किसानों के लिये अनुपयोगी जैव-कचरे के सदुपयोग के माध्यम से उनकी आय में बढ़ोत्तरी करने में सहायक होगा।

जैव-ईंधन और आर्थिक सुरक्षा:    

  • चीनी उद्योग के लिये सहायक: भारत में इथेनॉल उत्पादन के लिये प्रयोग किया जाने वाला प्रमुख कच्चा सामग्री के रूप में गन्ना और इसके उप-उत्पाद हैं, जो ‘इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम’ (Ethanol Blending Programme- EBP) के तहत 90% तेल उत्पादन के उत्तरदायी है। यह कार्यक्रम आर्थिक दबाव झेल रहे चीनी उद्योग में पूंजी बढ़ाने के साथ किसानों को आय का एक वैकल्पिक स्त्रोत उपलब्ध कराने में सक्षम है।
  • कृषि बाज़ारों का विविधीकरण: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अंतर्गत भंडारित अधिशेष मक्के और चावल को इथेनॉल उत्पादन में प्रयोग किये जाने के मौजूदा निर्णय का आशय है कि इससे कृषकों को अपने उत्पाद के लिये एक वैकल्पिक बाज़ार प्राप्त हो सकेगा।
  • बंजर भूमि सेआय: जैव-ईंधन के संदर्भ में ‘राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति-2018’ के अंतर्गत, वर्ष 2030 तक पारंपरिक डीज़ल में 5% जैव-ईंधन मिश्रण का लक्ष्य रखा गया है।यह नीति गैर-खाद्य तिलहनों, प्रयुक्त कुकिंग ऑयल और लघु अवधि वाली फसलों से बायोडीज़ल उत्पादन के लिये आपूर्ति शृंखला तंत्र की स्थापना को प्रोत्साहित करती है। इन फसलों को विभिन्न राज्यों के उन क्षेत्रों में भी आसानी से उत्पादित किया जा सकता है, जो या तो बंजर हैं या खाद्य फसलों के उत्पादन के लिये उपयुक्त नहीं हैं। इस प्रकार जैव-ईंधन के लिये चिह्नित फसलों का उत्पादन, कृषिगत आय को बढ़ावा देता है।

चुनौतियाँ:   

  • खाद्य सुरक्षा और खाद्य पदार्थों के लागत में वृद्धि: जैव-ईंधन उत्पादन में कच्चे माल के रूप में अधिकांशतः कई ऐसी फसलों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप (मानव आहार) या अप्रत्यक्ष रूप (पशुओं के आहार के रूप में) से दैनिक जीवन में प्रयोग में लाया जाता है।इन कृषि फसलों का प्रयोग जैव-ईंधन के लिये किये जाने के फलस्वरूप, कृषि भूमि के क्षेत्रफल और इन फसलों के उत्पादन में वृद्धि हेतु प्रदूषणकारी कीटनाशकों, शाक नाशक तथा उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि होगी।साथ ही ऐसे कृषि उत्पादों की मांग में वृद्धि के कारण खाद्य पदार्थों के मूल्य में भी वृद्धि संभव है।
  • तकनीकी सीमाएँ: जैव-ईंधन के प्रयोग में कई अन्य प्रकार की तकनीकी समस्याएँ भी समाहित हैं, उदाहरण- लंबे समय तक परिचालन के लिये वाहन के इंजन की क्षमता आदि।
  • वनोन्मूलन और कृषि क्षेत्र में वृद्धि (पर्यावरण से सम्बंधित) : जैव-ईंधन के उत्पादन के लिये आवश्यक कच्चे माल के रूप में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख फसलों को जंगलों से साफ की गई भूमि पर उगाया जाता है, भूमि उपयोग के संरचना में इस प्रकार का बदलाव स्थलीय कार्बन स्टॉक को वातावरण में निर्मुक्त कर ग्रीनहॉउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि कर सकता है।

यह अनुमान है कि 2030 तक भारत में जैव ईंधन उत्पादन के लिए कृषि अवशेषों की शुद्ध उपलब्धता लगभग 166.6 मिलियन टन होगी। उसी वर्ष तक ईंधन सम्मिश्रण (20% के लक्ष्य सम्मिश्रण दर पर विचार) के लिए इथेनॉल की मांग लगभग 13.7 मिलियन टन होगी।

 

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