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प्रश्न – जाति व्यवस्था नई पहचान और साहचर्य रूप धारण कर रही है। इसलिए, भारत में जाति व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता है। टिप्पणी कीजिये| – 29 April

उत्तर

जाति एक व्यापक पदानुक्रमित संस्थागत व्यवस्था को संदर्भित करती है जिसके साथ बुनियादी सामाजिक कारक जैसे जन्म, विवाह, भोजन-साझाकरण आदि को पद और स्थिति के पदानुक्रम में व्यवस्थित किया जाता है। ये उप-विभाजन पारंपरिक रूप से व्यवसायों से जुड़े हुए हैं और अन्य उच्च और निचली जातियों के संबंध में सामाजिक संबंधों को तय करते हैं। जातियों की पारंपरिक श्रेणीबद्ध व्यवस्था ‘शुद्धता’ और ‘दूषण’ के बीच अंतर पर आधारित थी। जबकि हाल के दिनों में पदानुक्रम की अभिव्यंजना काफी हद तक बदल गई है, परन्तु सिस्टम स्वयं बहुत ज्यादा नहीं बदला है। उदाहरण के लिए- भले ही भारत के संविधान के अंतर्गत अस्पृश्यता और जाति-आधारित भेदभाव वर्जित है, लेकिन मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसे व्यवसायों में निम्न जातियों के ही अधिकांश कार्यकर्ता होते हैं ।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि जाति व्यवस्था बदलती रही है। हालांकि सिस्टम के विभिन्न पहलुओं में इस परिवर्तन कि दर एक समान नहीं रही है।

नई पहचान और साहचर्य रूप:

  • राजनीतिक: पुरानी संरचना के विपरीत, विभिन्न जाति समुदायों ने जातिगत पहचान के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन करके खुद को मजबूत किया है। उदाहरण के लिए- बहुजन समाज पार्टी जिसके कारण जाति पर आधारित राजनीतिक गोलबंदी बढ़ती रही है। लिंगायतों की मांग है कि उनको अल्पसंख्यक समुदाय माना जाता है।
  • सामाजिक: वैश्वीकरण और तकनीकी प्रगति के प्रभाव के कारण विवाह और उत्तराधिकार के सख्त नियम, अधिक अंतर-जातीय विवाह के साथ मंद हो गए हैं। सामाजिक बहिष्कार और समुदायों द्वारा जाति-आधारित विभाजन को बनाए रखने की अभिव्यक्ति हालांकि गायब नहीं हुई है, लेकिन अधिक सूक्ष्म हो गई है। उदाहरण के लिए- वैवाहिक विज्ञापन जो अक्सर समाचार पत्रों में होते हैं, विशेष रूप से विशेष समुदायों से दुल्हन और दूल्हे की मांग करते हैं। यहां तक कि मुस्लिमों और ईसाई धर्म जैसी जाति व्यवस्था का पालन नहीं करने वाले धर्मों ने भी जाति जैसे भेदभाव को देखा है। ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले दलितों के लिए केरल जैसे राज्यों में अलग कब्रिस्तान हैं।
  • आर्थिक: पिछड़ी जातियों और अनुसूचित लोगों को लक्षित करने वाली विकास नीतियों ने केवल आबादी के एक वर्ग को लाभ पहुंचाया है। ये वर्ग कुलीन वर्ग के रूप में उभरे हैं और इसने पिछड़ी जातियों के भीतर विभाजन पैदा किया है। इन नीतियों ने जाति-आधारित जुटाव को मजबूत किया है। उदाहरण के लिए: मराठा, खाप और पाटीदार जैसी प्रमुख जातियां आरक्षण की मांग करती रही हैं। जाटों जैसे सामाजिक रूप से सशक्त और भूमि स्वामित्व वाले समुदायों ने भी खुद को एक जुट किया है और आरक्षण की मांग की है।

इस प्रकार, अंतरजातीय विवाह के माध्यम से सामाजिक एकीकरण के लिए डॉ. अंबेडकर योजना के तहत अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है। इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।

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