प्रश्न – उच्च विकास के लगातार प्रचलन के बावजूद अभी भी भारत मानव विकास सूचकांक के निम्न पायदान पर बना हुआ है। उन विषयों की जाँच कीजिये जो संतुलित और समावेशी विकास के मार्ग को दुष्कर बनाती हैं।

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प्रश्न – उच्च विकास के लगातार प्रचलन के बावजूद अभी भी भारत मानव विकास सूचकांक के निम्न पायदान पर बना हुआ है।  उन विषयों की जाँच कीजिये जो संतुलित और समावेशी विकास के मार्ग को दुष्कर बनाती हैं। – 2 September 2021

उत्तर

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2020 के अनुसार, भारत 189 देशों में 131वें स्थान पर है। भारत 1991 से तेजी से विकसित हुआ है। जबकि भारत जीडीपी विकास के मामले में आगे बढ़ रहा है, यह मानव विकास के मोर्चे पर खराब प्रदर्शन कर रहा है। इसका अर्थ है कि लाखों भारतीयों के पास अधिक उन्नत देशों की तुलना में या यहां तक कि ब्रिक्स जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक पहुच के अवसरों की कमी है।

‘मानव विकास’ को संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक और विश्व बैंक मानव पूंजी सूचकांक द्वारा सर्वोत्तम रूप से संगणित किया जाता है। जबकि, आर्थिक विकास को सकल घरेलू उत्पाद या सकल राष्ट्रीय उत्पाद द्वारा मापा जाता है। यह भी सत्य है कि, आर्थिक विकास और मानव विकास के बीच एक मजबूत संबंध मौजूद है क्योंकि आर्थिक विकास, मानव विकास में निरंतर सुधार की अनुमति देने के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करता है।

ऐसे मुद्दे को संतुलित और समावेशी विकास को छद्म बनाते हैं:

  • रोजगारविहीन विकास: चूंकि भारत की वृद्धि सेवाओं के नेतृत्व में है (जो श्रम प्रधान क्षेत्र नहीं है), इसलिए इसे रोजगार रहित विकास माना गया है. इसका कारण यह है कि आर्थिक विकास के समान स्तर के सापेक्ष रोजगार वृद्धि/सृजन में गिरावट आई है। इस प्रकार विकास ने केवल भारत के एक बहुत छोटे वर्ग को प्रभावित किया है।
  • असमान वृद्धि: विकास का परिमाण सभी क्षेत्रों और स्थानों में प्राय: असमान रहा है। उदाहरण के लिए, कृषि पिछड़ रहा है और कुछ क्षेत्रों में दूसरों की तुलना में तेजी से प्रगति हुई है। नीतिनिर्धारण में भी कृषि क्षेत्र की अपेक्षाकृत उपेक्षा की जाती है।
  • लैंगिक असमानता: भारत जैसे अत्यधिक पितृसत्तात्मक देश में कोई भी भारत से लैंगिक समानता पर उच्च स्तर की उम्मीद नहीं कर सकता है। कुपोषण का 50 प्रतिशत हिस्सा भोजन की कमी या खराब आहार के कारण नहीं, बल्कि खराब पानी, खराब स्वच्छता तथा अस्वच्छ प्रथाओं के कारण होता है।
  • कुपोषण: कई सरकारी योजनाओं के बाद भी शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर दोनों ही उच्च बनी हुई है। भारतीय बच्चों में कुपोषण का एक उच्च प्रसार है, जो बाल स्टंटिंग, वेस्टिंग और कम वजन के उच्च प्रतिशत में परिलक्षित होता है। खासतौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य की अनदेखी एक बड़ा मुद्दा है। इसके अलावा, भारत में वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं।
  • धन का असमान वितरण: पिछले पांच वर्षों में, भारत में सबसे धनी लोगों में से केवल 1% ने अपनी संपत्ति में लगभग 60% की वृद्धि की और भारत में सबसे अमीर 10% के पास शेष 90% की तुलना में चार गुना अधिक संपत्ति है। इसके परिणामस्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों में धन का असमान वितरण होता है और यह भारतीय सामाजिक-आर्थिक प्रतिमान में उच्च असमानता की व्यापकता को दर्शाता है जिसके कारण गैर-समावेशी विकास और निम्न मानव विकास हुआ।
  • खराब शिक्षा और स्वास्थ्य: समान रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, भारत शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट अपेक्षाकृत कम है। भारत जीडीपी का 3% शिक्षा पर और जीडीपी का 5% स्वास्थ्य पर खर्च करता है। स्वतंत्र भारत ने प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक शिक्षा के बड़े पैमाने पर औपनिवेशिक अधिरचना को बरकरार रखा, जो परीक्षा में अंकों के साथ रटकर सीखने जोर देता है। नतीजतन, पहुंच, गुणवत्ता और परिणाम सभी का प्रदर्शन निम्नतम हैं।

उपाय:

  • भारत को डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया जैसी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से देश में पहुंच और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
  • उच्च जीवन स्तर के लिए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश में काम मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से बढ़े। बेरोजगारी को कम करने में नीतियों की भूमिका के लिए रोजगार गारंटी योजनाओं के मामले में देश के प्रयासों की सराहना की गई है, लेकिन यह अभी भी किसी भी तरह से दीर्घकालिक उपाय नहीं है।
  • भारत सरकार को शिक्षा में गुणवत्ता और पहुंच में सुधार पर भी ध्यान देना चाहिए। समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में शिक्षा की प्रमुख भूमिका है। यह विशेष रूप से आगे चलकर अनौपचारिक रोजगार की हिस्सेदारी को कम करने और सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
  • भारत को अप्रचलित पुराने कानूनों द्वारा शासित अपने कठोर श्रम बाजार में सुधार करने, बाल श्रम और जबरन श्रम की समस्याओं का समाधान करने और मजदूरी समानता लाने की तत्काल आवश्यकता है।
  • विशेष रूप से कम जीवाश्म ईंधन सब्सिडी के माध्यम से, और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने में तेजी लाने के लिए ऊर्जा और संसाधन दक्षता बढ़ाने के प्रयासों की आवश्यकता है।
  • सरकार को डिजिटल डिवाइड को रोकने के प्रयास करने चाहिए, क्योंकि इससे सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन पैदा होता है।

मानव विकास और आर्थिक विकास एक दूसरे के संबंध में एक कारण और प्रभाव के रूप में सहसम्बन्धित हैं। इसलिए, मानव पूंजी में निवेश किए बिना और वर्तमान आर्थिक मंदी को संबोधित किए बिना, 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य, भारत के लिए एक कोरा-स्वप्न बना रहेगा।

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