डब्ल्यूएचओ की ‘चिल्ड्रन एंड डिजिटल डंपसाइट्स’ रिपोर्ट

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डब्ल्यूएचओ की ‘चिल्ड्रन एंड डिजिटल डंपसाइट्स’ रिपोर्ट

डब्ल्यूएचओ की ‘चिल्ड्रन एंड डिजिटल डंपसाइट्स’ रिपोर्ट

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा  ‘चिल्ड्रन एंड डिजिटल डंपसाइट्स’ (Children and Digital Dumpsites) शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

‘WHO’ की इस रिपोर्ट में उन बच्चों के जोखिम में होने के बारे में अध्ययन किया गया है जो बेकार इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों या ई-कचरे के अनौपचारिक प्रसंस्करण में काम करते हैं ।

क्या होता है ई-वेस्ट (ई-कचरा)

ई-वेस्ट से तात्पर्य पुराने, इलेक्ट्रोनिक सामन या बेकार होने पर फेंक दिए गए बिजली चालित सभी उपकरणों से हैं। इसमें कम्प्यूटर, फोन, फ्रिज, एसी से लेकर टीवी, बल्ब, खिलौने और इलेक्ट्रिक टूथब्रश जैसे सभी तरह गैजेट सम्मिलित होते  हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दु

  • रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में 1.8 करोड़ बच्चे और किशोर इनमें से कुछ की उम्र तो 5 वर्ष से भी कम है, ई-कचरा डंपिंग स्थलों या इस तरह के औद्योगिक क्षेत्रों पर अनौपचारिक रूप से कार्य कर रहे हैं ,जिससे इनके स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है। ऐसे ज्यादातर बच्चे निम्न और मध्यम आय वाले देशों के हैं।
  • इसी तरह लगभग 1.29 करोड़ महिलाएं जहरीले इलेक्ट्रॉनिक कचरे से जुड़े अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, इससे न केवल उन महिलाओं के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है बल्कि उनके अजन्में बच्चों को भी इससे खतरा है।
  • प्रायः देखा गया है कि गरीब बच्चों के माता-पिता उन्हें इलेक्ट्रॉनिक कचरे की रीसाइक्लिंग के कार्य में लगा देते हैं क्योंकि बच्चों के छोटे-छोटे हाथ इस कार्य में बड़ों की तुलना में कहीं ज्यादा कुशल होते हैं।
  • इसके अलावा अन्य बच्चे भी इसके संपर्क में आते हैं जो इस इलेक्ट्रॉनिक कचरे के आसपास रहते हैं या स्कूल जाते हैं।उनके इस कचरे में मौजूद जहरीले केमिकल्स के संपर्क में आने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इस तरह के कचरे में सीसा और पारा मौजूद होता है जो उन बच्चों की बौद्धिक क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है।

ई-वेस्ट का स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव

  • ई-कचरे के संपर्क में आने वाले बच्चे अपने छोटे आकार, और अपने कम विकसित अंगों और विकास की तीव्र दर के कारण ई-कचरे में मौजूद जहरीले केमिकल्स के प्रति अति संवेदनशील होते हैं। बच्चे अपने आकार की तुलना में अधिक प्रदूषकों को अवशोषित कर लेते हैं। उनका शरीर विषाक्त पदार्थों को पचाने और शरीर से बाहर निकालने में वयस्कों की तुलना में कम सक्षम होता है।
  • ई- कचरेमें 1000 से अधिक कीमती धातुएँ और अन्य पदार्थ जैसे सोना, तांबा, सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम, पॉलीब्रोमिनेटेड बाइफिनाइल और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन आदि पाए जाते हैं। इनका प्रसंस्करण प्रायः कम आय वाले देशों में किया जाता है, जिनके पास उचित सुरक्षा विनियमन नहीं होती है इस वजह से यह प्रक्रिया और भी खतरनाक बन जाती है।
  • एक गर्भवती महिला के इस कचरे के संपर्क में आने से उसके अजन्मे बच्चे का समय से पहले जन्म, मृत्यु और उसके विकास पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा यह उसके मानसिक विकास, बौद्धिक क्षमता और बोलने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
  • ई-कचरा बच्चों की सांस लेने की क्षमता और फेफड़ों के कार्यप्रणाली पर भी असर डालता है। यह बच्चों के डीएनए को हानि पहुंचा सकता है। इससे थायरॉयड सम्बन्धी विकार और बाद में उनमें कैंसर और हृदय रोग जैसी बीमारी हो सकती है ।

विश्व भर में उत्पादित ई-कचरे की मात्रा

  • ग्लोबल ई-वेस्ट स्टैटिस्टिक्स पार्टनरशिप के अनुसार, वर्ष 2019 में वैश्विक स्तर पर करीब 5.36 मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था, जो कि पिछले पांच वर्षों में करीब 21% तक बढ़ गया है। यह इतना ई-कचरा है जिसके यदि कुल वजन का अनुमान लगाया जाए तो यह करीब 350 क्रूज जहाजों जितना भारी था और यदि इसे एक लाइन में रख दिया जाए तो इसकी लम्बाई करीब 125 किलोमीटर होगी।
  • अनुमान है कि आने वाले समय में जिस तरह कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामन के प्रति रूचि बढ़ रही है उससे इस कचरे में और वृद्धि हो जाएगी।
  • आंकड़ों के अनुसार, इसमें से केवल 17.4% कचरा ही औपचारिक रूप से प्रबंधन या पुनर्चक्रण सुविधाओं तक पहुंचा था। बाकी को अवैध रूप से कम या मध्यम आय वाले देशों में डंप कर दिया गया था जहां इसको अनौपचारिक तरीके से निपटान किया जाता है।
  • पर्यावरण की दृष्टि से भी ई-कचरे का उचित तौर पर संग्रहण और पुनर्चक्रण अति महत्वपूर्ण है। वर्ष 2019 में जितना ई-कचरा औपचारिक रूप पुनर्नवीनीकृत किया गया था उससे करीब 1.5 करोड़ टन कार्बनडाइऑक्साइड में कमी आई थी।

भारत में ई-कचरे का उत्पादन एवं प्रबंधन

  • वर्ष 2018 में ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) को बताया कि भारत में ई-कचरे का 95% पुनर्नवीनीकरण अनौपचारिक क्षेत्र के द्वारा ही किया जाता है और अधिकांश स्क्रैप डीलर इसे अवैज्ञानिक तरीके से जलाकर या एसिड में घोलकर इसका निपटान करते हैं।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा ‘रास्ट्रीय हरित प्राधिकरण’ (एनजीटी) के साथ साझा किए गए डेटा से पता चलता है कि भारत में वर्ष 2019-20 में दस लाख टन से अधिक ई-कचरा पैदा हुआ था। वर्ष 2017-18 के मुकाबले वर्ष 2019-20 में ई-कचरे में सात लाख टन की वृद्धि हुई थी। इसके विपरीत वर्ष 2017-18 से ई-कचरे के विघटन और पुनर्चक्रण की क्षमता में बढ़ोतरी नहीं देखी गई है।
  • ई-वेस्ट प्रबंधन और परिचालन नियम (2011) के स्थान पर ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने ‘ई-वेस्ट प्रबंधन नियम’ (2016) को अधिसूचित किया था। साथ ही वर्ष 2018 में इसमें उत्पादकों से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर संशोधन भी किए गए थे। विषैले और खतरनाक पदार्थों के अपशिष्ट के निपटान के लक्ष्य निर्धारित करने के अलावा, एक ‘विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व’ (एक्सटेन्डेड प्रोड्युसर रिस्पॉन्सिबिलिटी- ईपीआर) योजना की भी शुरुआत की है।
  • ई-अपशिष्ट संग्रहण लक्ष्यों के अनुसार , वर्ष 2019-20 में ईपीआर के तहत अपशिष्ट उत्पादन की मात्रा का वजन के अनुसार 40% संग्रहण का लक्ष्य रखा गया था। वर्ष 2021-22 के लिए यह 50 %, वर्ष 2022-23 के लिए 60% और उससे आगे के लिए 70%है। संशोधित नियमों में कहा गया है कि “ई-अपशिष्ट का संग्रहण, भंडारण, परिवहन, नवीकरण, भंजन, पुनर्चक्रण और निपटान’’ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के निर्देश के अनुसार होगा।

स्रोत: द हिन्दू

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