आपदा प्रबंधन पर टारगेट G रिपोर्ट जारी

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आपदा प्रबंधन पर टारगेट G रिपोर्ट जारी

“ग्लोबल स्टेटस ऑफ मल्टी- हैजर्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम्स (MHEWS) – टारगेट G” रिपोर्ट जारी की गई है।

यह संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट सेंडाई फ्रेमवर्क के टारगेट – G के मामले में MHEWS की वर्तमान वैश्विक स्थिति का आकलन करती है।

टारगेट – G, सेंडाई के सात लक्ष्यों में से एक है । सेंडाई फ्रेमवर्क आपदा जोखिम में कमी और रोकथाम के लिए एक वैश्विक रणनीति है ।

टारगेट-G का उद्देश्य वर्ष 2030 तक MHEWS की उपलब्धता और इस तक पहुंच सुनिश्चित करना है। साथ ही, आपदा जोखिम सूचना और आकलन में वृद्धि करना है पूर्व – चेतावनी प्रणाली (EWS) तूफान, सुनामी आदि सहित अन्य आसन्न खतरों से पहले जन और धन की हानि को कम करती है ।

EWS के चार घटक निम्नलिखित हैं:

  1. जोखिम के बारे में ज्ञान;
  2. तकनीकी निगरानी और चेतावनी सेवा;
  3. चेतावनियों का संचार और प्रसार तथा
  4. आवश्यक कदम उठाने की समुदाय की क्षमता ।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • मानव जनित जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी अप्रत्याशित घटनाओं के कारण चरम मौसम की घटनाओं/ आपदाओं की आवृत्ति एवं तीव्रता में वृद्धि हुई है।
  • विश्व के आधे देशों को MHEWS की सुरक्षा प्राप्त नहीं हैं।
  • विश्व में 6 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां जलवायु परिवर्तन, और इससे जुड़ी आपदाओं का अधिक खतरा है।

टारगेटG प्राप्त करने के लिए सुझाव

  • पूर्व चेतावनी प्रणाली (EWS) के सभी घटकों (विशेष रूप से विपदा की जानकारी) में निवेश की जरूरत है। इससे बेहतर योजना निर्माण और क्षमता निर्माण में मदद मिलेगी।
  • एनहैंस्ड डेटा में निवेश और प्रौद्योगिकी तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने की जरूरत है। इससे निगरानी को बेहतर करने और तेज संचार आदि में मदद मिलेगी।

भारत में की गई पहलें

  • भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने क्षेत्रीय भूस्खलन पूर्व-चेतावनी प्रणाली (LEWS) का एक प्रोटोटाइप विकसित किया है ।
  • भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) ने स्टॉर्म सर्ज EWS और भारतीय सुनामी पूर्व – चेतावनी केंद्र (ITEWC) की स्थापना की है।
  • रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (DGRE) हिमस्खलन की अग्रिम चेतावनी प्रदान करता है ।

वैश्विक पहलें

  • मौसम और जलवायु से संबंधित बुनियादी डेटा के सृजन व आदान-प्रदान के लिए ‘ग्लोबल बेसिक ऑब्जर्विंग नेटवर्क (GBON) की स्थापना की गई है।
  • अल्प विकसित देशों (LDCs) तथा लघु द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) में रहने वाले लोगों के लिए ‘क्लाइमेट रिस्क एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम्स’ (CREWS) की स्थापना की गई है।
  • आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए ‘रिस्क – इन्फॉर्मड अर्ली एक्शन पार्टनरशिप ( REAP) शुरू की गई है।

स्रोत – द हिन्दू

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