जीन एडिटिंग से विलुप्त पेड़ को पुनर्जीवित करने की तैयारी

जीन एडिटिंग से विलुप्त पेड़ को पुनर्जीवित करने की तैयारी

हाल ही में कई देशों में जेनेटिकली इंजीनियर्ड (GE) वृक्षों पर परीक्षण किया जा रहा है।

अमेरिका में विकसित और फील्ड – टेस्ट से गुजरे अमेरिकन चेस्टनट ट्री के GE संस्करण को जंगलों में उगाने के लिए सरकारी एजेंसियों से मंजूरी का इंतजार है।

इस संस्करण को डार्लिंग 58 के रूप में नामित किया गया है।

कई अन्य देश भी वाणिज्यिक वृक्षारोपण के लिए वृक्ष की GE किस्मों पर परीक्षण कर रहे हैं।

चीन ने चिनार (poplar) के वृक्षों की कीट- प्रतिरोधी दो GE किस्मों के व्यावसायिक वृक्षारोपण की अनुमति दी है।

भारत रबड़ के वृक्ष की GE किस्म का परीक्षण कर रहा है। इसके तहत वृक्ष में MnSOD (मँगनीज युक्त सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज़) नामक जीन की अतिरिक्त प्रतियां समाहित कर इसे चरम जलवायु दबावों को सहन करने में सक्षम बनाया जा रहा है।

रबड़ की GE किस्म गैर-पारंपरिक रबड़ उत्पादक राज्यों (जैसे- असम, मिजोरम) को बेहतर गुणवत्ता वाली रबड़ की खेती करने में सक्षम बनाएगी ।

GE वृक्ष, किसी वृक्ष के DNA को जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीकों के उपयोग से संशोधित करके बनाया जाता है।

ज्यादातर मामलों में यह पादप में उन नए लक्षणों को जन्म देता है, जो प्राकृतिक रूप से उस प्रजाति में नहीं पाए जाते हैं ।

वहीं GM (जेनेटिकली मोडिफाइड) फसल एक ऐसा पादप होता है, जिसमें आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके प्राप्त आनुवंशिक सामग्री के एक नए संयोजन का समावेश किया जाता है।

GE वृक्षों का महत्त्व

इससे बड़े आकार के, तेजी से बढ़ने वाले रोगों का प्रतिरोध करने में सक्षम और कार्बन के अवशोषण में वृद्धि करने वाले वृक्षों का विकास करके जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना किया जा सकता है।

ऐसे वृक्षों से जैव ईंधन और काष्ठ के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

इससे काष्ठ, लुगदी और कागज उद्योग को आर्थिक लाभ प्राप्त होगा ।

GE वृक्षों से जुड़ी चिंताएं

इनसे अन्य वृक्षों के दूषित होने तथा साथ ही उन पर निर्भर रहने वाले पशुओं व कीट प्रजातियों के भी प्रभावित होने का ख़तरा उत्पन्न हो सकता है ।

पुराने होने के साथ GE वृक्ष कैसा व्यवहार करेंगे, इस बारे में जानकारी का अभाव है।

इनके आक्रामक ( Invasiveness) प्रजाति होने का पता लगने में समय लग सकता है। यूकलिप्टस जैसे काष्ठ उत्पादक वृक्षों के आक्रामक प्रभावों को सामने आने में 100 वर्ष से अधिक का समय लग सकता है।

स्रोत – डाउन टू अर्थ

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