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जलियाँवाला बाग हत्याकांड की 102वीं वर्षगांठ

जलियाँवाला बाग हत्याकांड की 102वीं वर्षगांठ

भारतीय प्रधानमंत्री ने हाल ही में जलियाँवाला बाग हत्याकांड की 102वीं वर्षगांठ पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के 130वें स्थापना दिवस के अवसर पर जलियाँवाला बाग हत्याकांड की शताब्दी को संबोधित करने वाली एक प्रदर्शनी “जलियाँवाला बाग” का भी उद्घाटन किया है ।

विदित हो कि 13 अप्रैल, 1919 को, जलियाँवाला बाग में आयोजित एक शांतिपूर्ण बैठक में शामिल लोगों पर की गयी गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए थे।

घटना की पृष्ठभूमि

  • 10 मार्च, 1919 को अंग्रेजों द्वारा एक अधिनियम पारित किया गया जिसे रॉलेट एक्ट या काला कानून के नाम से जाना जाता है ।
  • अराजक और क्रांतिकारी अपराध कानून(Anarchical and Revolutionary Crimes Act), 1919 के तहत अंग्रेजोंको अब किसी व्यक्ति को जिससे उनको देशव्यापी अशांति फैलने का डर था, बिना मुकदमा चलाए कैद करने का अधिकार मिल गया था ।
  • इसी कानून के तहत पंजाब के क्रांतिकारी नेता सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को अंगेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था।
  • इसी कारण13 अप्रैल, 1919 को सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की रिहाई की मांग करने के लिये जलियाँवाला बाग में लगभग 10,000 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की भीड़ जमा हुई।
  • तभी ब्रिगेडियर- जनरल डायर ने अपने सैनिकों के साथ घटनास्थल पर पहुँचकर सभा को घेर लिया और एकत्रित भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।

परिणाम:

  • इस घटना के प्रतिरोध में बंगाली कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ब्रिटिश नाइटहुडकी उपाधि त्याग दी एवं महात्मा गांधी ने ‘कैसर-ए-हिंद’ की अपनी उपाधि को त्याग दिया।
  • ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि गाँधी जी को बोअर युद्ध (Boer War) के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा प्रदान की गई थी।
  • इस घटना की जांच के लिए 14 अक्तूबर, 1919 को भारत सरकार ने डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमेटी का गठन किया। यह समिति लॉर्ड विलियम हंटर की अध्यक्षता में गठित की गई थी इसलिए इसे हंटर आयोग (Hunter Commission) के नाम से जाना जाता है। इसमें कुछ भारतीय भी सम्मिलित किये गए थे।
  • इस आयोग ने मार्च 1920 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें सर्वसम्मति से डायर के कृत्यों की निंदा की गई और उसे पद से इस्तीफा देने का आदेश दिया गया औरवर्ष 1922 में रोलेट एक्ट को अंग्रेजों द्वारा निरस्त कर दिया गया।
  • इस घटना पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी अपनी गैर-आधिकारिक समिति नियुक्त की जिसमें सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू, एम. आर. जयकर,अब्बास तैयब जी और महात्मा गांधी को सम्मिलित किया गया था।

स्रोत – पीआइबी

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