चार्जशीट यानी आरोप पत्र ‘सार्वजनिक दस्तावेज’ नहीं : सुप्रीम कोर्ट

चार्जशीट यानी आरोप पत्र सार्वजनिक दस्तावेजनहीं : सुप्रीम कोर्ट

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि चार्जशीट (chargesheets) यानी आरोप पत्र ‘सार्वजनिक दस्तावेज’ (public documents) नहीं हैं।

  • न्यायालय ने यह भी कहा कि यह दस्तावेज स्वतंत्र रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन करता है क्योंकि यह अभियुक्त, पीड़ित और जांच एजेंसियों के अधिकारों से समझौता करता है।
  • न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की दो – न्यायाधीशों की पीठ ने इसके ‘दुरुपयोग’ की आशंका के प्रति आगाह किया।

चार्जशीट के बारे में

  • चार्जशीट को CrPC की धारा 173 के तहत परिभाषित किया गया है। यह एक पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसियों द्वारा मामले की जांच पूरी करने के बाद तैयार की गई अंतिम रिपोर्ट है।
  • चार्जशीट तैयार करने के बाद, थाने का प्रभारी अधिकारी इसे एक मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करता है, जो इसमें उल्लिखित अपराधों की नोटिस लेने के लिए अधिकृत होता है। चार्जशीट में नाम, सूचना की प्रकृति और अपराधों का विवरण होना चाहिए।
  • क्या अभियुक्त गिरफ़्तार है, हिरासत में है, या रिहा किया गया है, क्या उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई की गई, ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका उत्तर आरोप पत्र में दिया गया है।
  • 60-90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर की जानी चाहिए, अन्यथा गिरफ्तारी अवैध होता है और आरोपी जमानत का हकदार हो जाता है।

चार्जशीट और FIR के बीच अंतर

  • ‘चार्जशीट’ शब्द को CrPC की धारा 173 के तहत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, लेकिन ‘प्रथम सूचना रिपोर्ट’ या FIR (First Information Report) को भारतीय दंड संहिता (IPC) या CrPC में परिभाषित नहीं किया गया है।
  • इसके बजाय, यह CrPC की धारा 154 के तहत पुलिस विनियमों/नियमों के तहत ‘संज्ञेय मामलों में सूचना’ के रुप में वर्णित है।
  • जहां चार्जशीट जांच के अंत में दायर की गई अंतिम रिपोर्ट है, वहीं प्राथमिकी यानी FIR ‘प्रथम’ अवसर पर दर्ज की जाती है कि पुलिस को एक संज्ञेय अपराध या अपराध के बारे में सूचित किया गया है जिसके लिए किसी को बलात्कार, हत्या, अपहरण के मामले में वारंट के बिना गिरफ्तार किया जा सकता है।
  • इसके अलावा, FIR किसी व्यक्ति के दोष को तय नहीं करती है, लेकिन चार्जशीट साक्ष्य के साथ सम्पूर्ण दोष को तय करती है और अक्सर मुकदमे के दौरान अभियुक्तों पर लगाए गए अपराधों को साबित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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