ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव समुद्र जल स्तर में वृद्धि

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ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव समुद्र जल स्तर में वृद्धि

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पता लगाया कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के कारण ‘लक्षद्वीप द्वीप समूह’ के आस-पास समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होगी। जल स्तर में होने वाली यह वृद्धि समुद्र तट के करीब वाले हवाई अड्डों और आवासीय क्षेत्रों को प्रभावित करेगी।

विदित हो कि लक्षद्वीप भारत का सबसे छोटा केंद्रशासित प्रदेश है। इस द्वीप समूह में छोटे-छोटे 36 द्वीप हैं,इसका क्षेत्रफल 32 वर्ग किमी. है।

समुद्री जल स्तर में वृद्धि :

  • विदित हो कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के परिणामस्वरुप दुनिया के महासागरों के जल स्तर में हुई वृद्धि हुई है, खास तौर पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से जो तीन प्राथमिक कारकों से प्रेरित है: तापीय विस्तार, ग्लेशियरों, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका क्षेत्र की बर्फ का पिघलना।
  • समुद्र जल स्तर को मुख्य रूप से ज्वार स्टेशनों और ‘सैटेलाइट लेज़र अल्टीमीटर’ के माध्यम से मापा जाता है।

समुद्री जल स्तर में वृद्धि के कारक

  • जल का ऊष्मीय विस्तार: जब जल गर्म होता है, तो जल के अणुओं में विस्तार होता है अर्थात जल फैलता है। पिछले 25 वर्षों में समुद्र के जल स्तर में वृद्धि का लगभग आधा भाग गर्म महासागरों के कारण है जो अपेक्षाकृत अधिक स्थान घेरते हैं।
  • ग्लेशियरों का पिघलना: ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान में वृद्धि होने के कारण पर्वतीय हिमनद गर्मियों में अधिक पिघलते हैं। यह अपवाह और समुद्र के वाष्पीकरण के मध्य असंतुलन की स्थिति पैदा करता है, जिससे समुद्र जल का स्तर बढ़ जाता है।
  • ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक बर्फ की प्लेटों को क्षति: तापमान में हुई वृद्धि के कारण ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को कवर करने वाली विशाल बर्फ की प्लेटें पर्वतीय ग्लेशियरों के समान और अधिक तीव्र गति से पिघल रही हैं जिससे समुद्र जल में और भी तेज़ी से वृद्धि हो रही है।

समुद्री जल स्तर में वृद्धिकी दर:

  • वैश्विक स्तर पर : ज्ञातव्य हो कि वैश्विक समुद्र स्तर में पिछली शताब्दी के दौरान वृद्धि हुई है, लेकिन हाल के दशकों में इसकी वृद्धि दर में तीव्रता देखी गई है। वर्ष 1880 से 2015 के बीच औसत वैश्विक समुद्र स्तर में 9 इंच की वृद्धि हुई है, जो पिछले 2,700 वर्षों की तुलना में बहुत तेज़ है।

वर्ष 2019 में ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (IPCC) की ‘द स्पेशल रिपोर्ट ऑन द ओशन एंड क्रायोस्फीयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट’ नामक एक रिपोर्ट में महासागरों, ग्लेशियरों और भूमि तथा समुद्र में बर्फ के जमाव में होने वाले गंभीर परिवर्तनों को रेखांकित किया गया था।

  • क्षेत्रीय स्तर पर: यह दुनिया भर के सभी हिस्सों में एक समान नहीं है। उपप्रवाह, कटाव, क्षेत्रीय महासागरीय धाराओं, अपस्ट्रीम बाढ़ नियंत्रण, भूमि की ऊँचाई में भिन्नता एवं हिमयुग के हिमनदों के संकुचित भार के कारण ‘क्षेत्रीय समुद्री जल स्तर’ में वृद्धिवैश्विक ‘जल स्तर में वृद्धि’ से अधिक या कम हो सकता है।

समुद्री जल स्तर में वृद्धि के परिणाम:

  • तटीय क्षेत्र की जैव विविधता का विनाश: समुद्री जल स्तर में वृद्धिविनाशकारी क्षरण, आर्द्रभूमि बाढ़, जलभृत और नमक के साथ कृषि मिट्टी संदूषण और जैव विविधता आवास की क्षति का कारण बन सकता है।
  • खतरनाक तूफानों में वृद्धि: समुद्र का बढ़ा हुआ जल स्तर अधिक खतरनाक तूफानों का कारण बन रहा है जिससे जान-माल की अधिक क्षति हो रहा है।
  • पार्श्व और अंतर्देशीय प्रवासन: निचले तटीय क्षेत्रों में आने वाली ‘बाढ़’ लोगों को उच्च भूमि क्षेत्र पर पलायन करने के लिये मजबूर कर रही है, जिससे दुनिया भर में शरणार्थी विस्थापन संकट पैदा हो रहा है।
  • बुनियादी ढाँचे पर प्रभाव: उच्च तटीय जल स्तर की संभावना से इंटरनेट की पहुँच एवंखाद्य वस्तुओं जैसी बुनियादी सेवाओं को भी खतरा है।
  • अंतर्देशीय जीवन के लिये खतरा: बढ़ता हुआ समुद्रीय जल स्तर नमक के साथ मिट्टी और भूजल को संदूसित कर सकता है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि के निदान के लिए उठाए गए कदम:

  • स्थानांतरण: बहुत से तटीय शहरी क्षेत्रों पुनर्वास को एक शमन रणनीति के रूप में अपनाने की योजना बना रहे हैं । उदाहरण स्वरुप ‘किरिबाती द्वीप’ ने ‘फिज़ी’ में स्थानांतरण की योजना बनाई है, इसी तरह ‘इंडोनेशिया’अपनी राजधानी को ‘जकार्ता’ से ‘बोर्नियो’में स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है ।
  • समुद्री दीवार का निर्माण: वर्ष 2014 में इंडोनेशिया ने एक विशाल समुद्री दीवार या “विशालकाय गरुड़” नामक एक तटीय विकास परियोजना शुरू की थी, यह परियोजना शहर को बाढ़ से बचाने का कार्य करेगी।
  • बिल्डिंग एनक्लोज़र: वैज्ञानिकों ने ‘उत्तरी यूरोपीय संलग्नक बाँध’ (NEED) का प्रस्ताव दिया है, इसमें उत्तरी सागर के सभी पंद्रह देशों को बढ़ते समुद्रों से बचाने के लिये सम्मिलित किया गया है। फारस की खाड़ी, भूमध्य सागर, आयरिश सागर ,बाल्टिक सागर, और लाल सागर को भी ऐसे क्षेत्रों के रूप में पहचाना गया जो समान मेगा बाड़ों से सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
  • पानी के प्रवाह संचालन हेतु वास्तुकला: डच शहर‘रॉटरडैम’ ने भी अस्थायी तालाबों के साथ “वाटर स्क्वायर” जैसी बाधाओं के लिए जल निकासी और नवीन वास्तुशिल्प सुविधाओं का निर्माण किया है ।

भारत की भेद्यता:

  • भारत में 7,516 किलोमीटर समुद्री तटरेखा है, इसमें 5,422 किलोमीटर तटीय रेखा 9 राज्यों की एवं 2,094 किलोमीटर की तटरेखा 4 केंद्र शासित प्रदेशों के द्वीपों की सम्मिलित है।
  • समुद्र तटीय व्यापार देश के कुल व्यापार का 90 प्रतिशत हिस्सा है और यह 3,331 तटीय गाँवों और 1,382 द्वीपों तक फैला हुआ है।

भारत के प्रयास:

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना: इसे वर्ष 2008 में जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री परिषद द्वारा जारी किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य जनता के प्रतिनिधियों, सरकार की विभिन्न एजेंसियों, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों के मध्यजलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरे और इसका मुकाबला करने के कदमों के बारे में जागरूकता फैलाना है।

स्रोत – पी आई बी

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