ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) परियोजना के लिए वन मंजूरी पर आपत्ति

ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) परियोजना के लिए वन मंजूरी पर आपत्ति

हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) परियोजना के लिए दी गई वन मंजूरी के संबंध में कथित विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट:

  • ग्रेट निकोबार आइलैंड (GNI) परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर के लिये तैयार की गई एक व्यापक परियोजना है।
  • नीति आयोग की ग्रेट निकोबार विकास योजना का उद्देश्य, ग्रेटर निकोबार के समग्र विकास को बढ़ावा देना है।
  • इस परियोजना में एक अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक बिजली संयंत्र तथा एक टाउनशिप कॉम्प्लेक्स का निर्माण शामिल है।
  • इस योजना के अंतर्गत, बायोस्फीयर रिजर्व की सीमाओं के भीतर कुल 244 वर्ग किमी हरे-भरे जंगल और तटीय क्षेत्रों का उपयोग शामिल है।
  • प्रस्तावित संयुक्त सैन्य-नागरिक, दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा भारतीय नौसेना के परिचालन नियंत्रण में होगा। इस परियोजना पर होने वाला अनुमानित व्यय लगभग 72,000 करोड़ रुपए है।
  • इस परियोजना के लिए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO), नोडल एजेंसी है।

प्रमुख तथ्य:

  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के प्रावधानों के कथित उल्लंघनों का हवाला देते हुए, NCST ने कथित तौर पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जिला पदाधिकारियों को इस आधार पर नोटिस जारी किया है कि प्रस्तावित परियोजना स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों को प्रभावित करेगी। यह भी कि इस मामले में NCST से परामर्श नहीं किया गया था।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा तैयार की गई कार्यान्वयन रिपोर्ट से पता चलता है कि FRA के तहत द्वीपीय प्रशासन ने स्थानीय आदिवासियों के वन अधिकार को न तो मान्यता दी और न ही इन्हें वन भूमि का स्वामित्व प्रदान किया, जो वन संरक्षण संशोधन नियम, 2017 के तहत चरण-1 की मंजूरी से पहले एक आवश्यक कदम है।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO) द्वारा कार्यान्वित की जा रही परियोजना में एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और ग्रीनफील्ड टाउनशिप शामिल हैं।
  • परियोजना का उद्देश्य लगभग 7.114 वर्ग किमी आदिवासी आरक्षित वन भूमि (tribal reserve forest land) का उपयोग करना है, जहां शौम्पेन नामक पर्टिकुलरली वल्नरेबल ट्राइबल ग्रुप (PVTG) और निकोबारी जनजाति रहते हैं। सरकार का कहना है कि परियोजना के लिए स्थानीय लोगों को विस्थापित नहीं किया जाएगा।
  • वन संरक्षण संशोधन नियमावली-2017 (FCR) के नियम 6 (3) (e) के अनुसार, वन भूमि को किसी अन्य कार्य के लिए डायवर्सन के लिए पहले जिला कलेक्टर को FRA के तहत स्थानीय आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता देने और इन्हें वन भूमि का स्वामित्व प्रदान करने की आवश्यकता होगी।
  • इसके पश्चात ही ये नियम अधिकारियों को अनुमति देते हैं कि वे इस भूमि के डायवर्सन के लिए अधिकार-धारक ग्राम पंचायतों की सहमति प्राप्त करें।
  • द्वीपीय प्रशासन का यह तर्क रहा है कि द्वीपों में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) अधिनियम, 1956 (PAT56) लागू है। यह पहले से ही वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के “हितों की पूर्ण सुरक्षा” प्रदान करता है।
  • PAT56 के तहत, ग्रेट निकोबार में वन भूमि के एक महत्वपूर्ण हिस्से को एक ट्राइबल रिजर्व के रूप में चिह्नित किया गया है, जिस पर स्थानीय आदिवासियों को अपने दैनिक जीवन के लिए आवश्यक होने पर संसाधनों का उपयोग और संग्रह करने का अधिकार दिया गया है।
  • ट्राइबल रिजर्व के रूप में भूमि की अधिसूचना जारी करने और अधिसूचना वापस लेने की शक्ति पूरी तरह से PAT56 के तहत द्वीपीय प्रशासक के पास है।
  • FRA वन भूमि पर व्यापक सामुदायिक अधिकारों की मान्यता प्रदान करता है। यह कानून वन समुदायों को वन भूमि के उपयोग को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने का अधिकार देता है, जिस पर उनका स्वामित्व है और इस भूमि के डायवर्सन के लिए उनकी सहमति अनिवार्य है।

स्रोत – द हिन्दू

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