गिरिजाघरों में ‘कन्फेशन’ की परंपरा

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गिरिजाघरों में ‘कन्फेशन’ की परंपरा

  • हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने अनुशंसा दी कि चर्च यानी गिरिजाघरों में ‘कन्फेशन’ की परंपरा को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए। इसके बाद से इस मुद्दे पर V-विवाद प्रारम्भ हो गया।
  • ज्ञात हो किगिरिजाघरों में पादरी के समक्ष गलतियों को स्वीकार करने की परंपरा को ‘कन्फेशन’ कहा जाता है।

पृष्ठभूमि:

केरल के मलंकारा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च के चार पादरियों के विरुद्ध अपने गिरिजाघर की एक विवाहित महिला का यौन उत्पीड़न करने का आरोप है।

केरल में पांच महिलाओं ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि, यह प्रथा इनके लिए संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।
चर्च की सदस्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है, कि इस प्रथा के कारण महिलाओं के यौन शोषण तथा पुरुष और महिला अनुयायियों की ब्लैकमेलिंग सहित कई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

 

प्रचलित प्रथा:

इस धार्मिक प्रथा के अनुसार, चर्च के सदस्य को पुजारी के समक्ष ‘सेक्रामेंटल कन्फेशन’ से गुजरना पड़ता है। यह प्रथा, कहा जाता है कि पाप से मुक्ति के लिए आवश्यक है और ईसाई होने की सांसारिक और आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा करने की शर्त हैं। यदि कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया से नहीं गुजरता है, तो चर्च की सेवाओं से वंचित कर दिया जाएगा।

यदि किसी व्यक्ति ने कन्फेशन नहीं किया है, तो उस व्यक्ति का नाम हलके के रजिस्टर से हटा दिया जाएगा और उसे चर्च की सभी गतिविधियों से रोक दिया जाता है।

यदि संबंधित व्यक्ति शादी करना चाहता है, तो उसे पहले अनिवार्य कन्फेशन करना होगा, ऐसा करने में विफल रहने पर उसे चर्च के सदस्य के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है।

उच्चतम न्यायलय निर्णय:

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मलंकारा आर्थोडाक्स सीरियन चर्च के वर्ष 1934 के संविधान की वैधता को बरकरार रखा था। इसमें चर्च के तहत आने वाले क्षेत्रों के नियंत्रण संबंधी नियमों का निर्धारण किया गया था।

स्रोत – द हिन्दू

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