ओलिव रिडले कछुओं की टैगिंग

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ओलिव रिडले कछुओं की टैगिंग

  • जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने ओडिशा में लुप्तप्राय ओलिव रिडले कछुओं को टैग करना शुरू कर दिया है।
  • जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) के वैज्ञानिकों ने बंगाल की खाड़ी के गहरे पानी में तैरते हुए 6 ओलिव रिडले कछुओं को टैग करके उन्हें वापस समुद्र में छोड़ दिया है। ये टैग एल्यूमीनियम से बने होते हैं।15 jan 2021, करंट अफेयर्स, हिन्दी करंट अफेयर्स, जैव विविधता, पर्यावरण, ओलिव रिडले कछुओं की टैगिंग
  • (जेडएसआई)के अनुसार, यह उनके आवागमन और प्रवासन मार्ग को जानने के लिए 30,000 कछुओं को टैग करेगा।
  • यह कछुए फरवरी में अंडे देने के लिए रशिकुल्या समुद्र तट पर आएंगे। रुशिकुल्या समुद्र तट कछुओं के लिए सबसे बड़े सामूहिक घोंसले के स्थानों में से एक है।
  • ओडिशा तट के साथ-साथ रशिकुल्या नदी के मुहाने, गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य और देवी नदी के मुहाने सहित बड़े पैमाने पर घोंसले के लिए लाखों लुप्तप्राय कछुए आते हैं।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII):

  • भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने कछुओं के प्रवास के मार्ग को निर्धारित करने के लिए 2007-2010 में एक अध्ययन किया था।
  • डब्ल्यूआईआई के अध्ययन के अनुसार, ओलिव रिडले कछुए, जो तब बड़े पैमाने पर घोंसले के लिए ओडिशा समुद्र तटों पर आए थे, श्रीलंका और यहां तक ​​किअंडमानद्वीपोंकेतटपरपाएगएथे।
  • ओडिशा सरकार ने हाल ही में डब्ल्यूआईआई से समुद्री कछुओं के प्रवास के मार्ग का निर्धारण करने के लिए नए सिरे से अध्ययन करने का अनुरोध किया था।

ओलिव रिडले:

  • ओलिव रिडले समुद्री कछुओं को ‘प्रशांत ओलिव रिडले समुद्री कछुओं’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह मुख्य रूप से प्रशांत, हिन्द और अटलांटिक महासागरों के गर्म जल में पाए जाने वाले समुद्री कछुओं की एक मध्यम आकार की प्रजाति है। ये माँसाहारी होते हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाला विश्व का सबसे पुराना और सबसे बड़ा संगठन आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेसन ऑफ़ नेचर-आईयूसीएन)द्वारा जारी रेड लिस्ट में इसे अतिसंवेदनशील (Vulnerable) प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है।
  • ओलिव रिडले कछुए हज़ारों किलोमीटर की यात्रा कर ओडिशा के गंजम तट पर अंडे देने आते हैं और फिर इन अंडों से निकले बच्चे समुद्री मार्ग से वापस हज़ारों किलोमीटर दूर अपने निवास-स्थान पर चले जाते हैं।
  • उल्लेखनीय है कि लगभग 30 साल बाद यही कछुए जब प्रजनन के योग्य होते हैं, तो ठीक उसी जगह पर अंडे देने आते हैं, जहाँ उनका जन्म हुआ था।
  • दरअसल अपनी यात्रा के दौरान भारत में गोवा, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश के समुद्री तटों से गुज़रते हैं, लेकिन प्रजनन करने औरघर बनाने के लिये ओडिशा के समुद्री तटों की रेत को हीचुनते हैं।

ओलिव रिडले के अस्तित्व पर संकट:

  • इन कछुओं को सबसे बड़ा नुकसान मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों से होता है।
  • कछुए समुद्र की गहराई में तैरते हैं, लेकिन समुद्र की सतह पर आने के दौरान ये मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों की चपेट में आ जाते हैं।
  • हालाँकि, इस संबंध में ओडिशा हाईकोर्ट ने आदेश दे रखा है कि कछुए के आगमन के रास्ते में संचालित होने वाले ट्रॉलरों में ‘टेड’ यानी टर्टल एक्सक्लूजन डिवाइस (एक ऐसा यंत्र जिससे कछुए मछुआरों के जाल में नहीं फँसते) लगाया जाए।

स्रोत – द हिन्दू

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