उच्चतम न्यायालय के अनुसार राजद्रोह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समक्ष एक गंभीर खतरा

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उच्चतम न्यायालय के अनुसार राजद्रोह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समक्ष एक गंभीर खतरा

उच्चतम न्यायालय के अनुसार राजद्रोह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समक्ष एक गंभीर खतरा

हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने केंद्र से प्रश्न किया है कि उसे भारतीय दंड संहिता (IPC)की औपनिवेशिक धारा 124A (राजद्रोह) को क्यों निरस्त नहीं करना चाहिए।

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, वर्ष 2016-2019 के मध्य राजद्रोह के मामलों की संख्या 160 प्रतिशत बढ़कर 93 हो गई थी। इसका उपयोग विशेषकर पत्रकारोंऔर कार्यकर्ताओं के विरुद्ध किया गया है।
  • साथ ही, उन लोगों के विरुद्ध भी कानून का विवेकहीन उपयोग किया गया है, जिन्होंने सरकार के कोविड प्रबंधन के बारे में अपनी शिकायतें व्यक्त की हैं।
  • राजद्रोह का अपराध तब माना जाता है, जब कोई व्यक्ति शब्दों या संकेतों के माध्यम से विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति अन्यथा घृणा या अवमानना उत्पन्न करता है या करने का प्रयास करता है, या असंतोष को उत्तेजित करने का प्रयास करता है।
  • आगे बढ़ते हुए, उच्चतम न्यायालय को केदारनाथ वाद (1962) में दिए निर्णय की पुनर्जाच करनी होगी। इस निर्णय में धारा 124A को आधुनिक संदर्भ में बरकरार रखा गया था, क्योंकि राज्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर बोझ लादने के लिए स्वयं दंडात्मक कानून का उपयोग कर रहा है।
  • भारत के विधि आयोग ने राजद्रोह पर अपने परामर्श पत्र (2018) में यह भी अवलोकन किया कि हालांकि राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए राजद्रोह के अपराध को बनाए रखना आवश्यक था, परन्तु इसका स्वतंत्र अभिव्यक्ति को रोकने हेतु एक उपकरण के रूप मन उपयोगी नहीं किया जाना चाहिए ।

कानून का विकास

राजद्रोह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के अंतर्गत एक संज्ञेय, गैर जमानती व गैर-समाधेय अपराध है।

स्वतंत्रता से पूर्व

1870: अंग्रेजों द्वारा IPC में राजद्रोह की धारा समावेशित की गई। ब्रिटिश शासकों ने स्वतंत्रता की मांग को दबाने के लिए इस कानून का प्रयोग किया था। उदाहरण के लिए, बाल गंगाधर तिलक औपनिवेशिक भारत में राजद्रोह के दोषी ठहराये जाने वाले प्रथम व्यक्ति थे ।

स्वतंत्रता के पश्चात

  • 1948: विचार-विमर्श में, भारतीय नेता संविधान से “राजद्रोह को हटाने के लिए सहमत हुए।
  • 1948:‘राजद्रोह’ अब इस वर्ष 28 नवंबर को अपनाए गए भारतीय संविधान का हिस्सा नहीं रहा। हालांकि, IPC की धारा 124A अभी भी बरकरार रही।
  • 1951: अनुच्छेद 19(12A) के अंतर्गत किए गए प्रथम संविधान संशोधन के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर युक्तियुक्त निबंधन’ लगाया गया।
  • 1974: धारा 124A को एक संज्ञेय अपराध घोषित किया गया, जिसने पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया था।

वर्तमान परिदृश्य

वर्ष 2019 के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि पिछले वर्ष की तुलना में राजद्रोह के मामलों में 25% और गिरफ्तारी में 41% की वृद्धि हुई है। हालांकि, केवल 3% मामलों में ही दोषसिद्धि हुई है।

स्रोत –द हिन्दू

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