असम में परिसीमन

असम में परिसीमन

हाल ही में, भारत निर्वाचन आयोग ने असम के लिए परिसीमन प्रस्ताव का मसौदा प्रकाशित किया। परिसीमन का यह मसौदा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 8-ए के प्रावधान के अनुसार तैयार किया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 170 और अनुच्छेद 82 के अनुसार,असम में विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया है।

अनुच्छेद 170 और 82 के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधान सभा में सीटों की संख्या और राज्यों को लोक सभा में सीटों का आवंटन तब तक नहीं बदला जाएगा जब तक कि वर्ष 2026 के बाद पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित नहीं किए हो जाते।

विदित हो कि असम में पिछली बार परिसीमन वर्ष 1976 में किया गया था।

प्रस्तावित परिसीमन

असम राज्य में विधान सभा और लोक सभा में सीटों की संख्या क्रमशः 126 और 14 निर्धारित की गई है।

विधान सभा की 126 सीटों में से 19 सीटों को अनुसूचित जनजातियों के लिए तथा 09 सीटों को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित किया गया है।

लोक सभा की 14 सीटों में से 2 सीटों को अनुसूचित जनजातियों के लिए तथा 1 सीट को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित किया गया है।

सभी निर्वाचन क्षेत्रों को यथा संभव भौगोलिक रूप से सुगठित क्षेत्र बनाने का प्रयास किया गया है और उनके परिसीमन में भौतिक विशेषताओं, जनसंख्या के घनत्व, प्रशासनिक इकाइयों की मौजूदा सीमाओं, संचार सुविधाओं और जन सुविधा को ध्यान में रखा गया है।

परिसीमन क्या है और इसे कैसे किया जाता है?

परिसीमन, लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को परिभाषित करने की प्रक्रिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्येक सीट पर मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।

निर्वाचन आयोग के आदेश के अनुसार, “परिसीमन अभ्यास के दौरान, आयोग भौतिक सुविधाओं, प्रशासनिक इकाइयों की मौजूदा सीमाओं, संचार की सुविधा और सार्वजनिक सुविधा को ध्यान में रखता है।

भारत निर्वाचन आयोग

यह एक संवैधानिक संस्था है, इसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 से लेकर 329 तक निर्वाचन आयोग के बारे में प्रावधान किया गया है

निर्वाचन आयोग की शक्तियां एवं कार्य

संसद के परिसीमन आयोग अधिनियम के आधार पर समस्त भारत के निर्वाचन क्षेत्रों के भू-भाग का निर्धारण करना।

समय-समय पर निर्वाचक नामावली तैयार करना और सभी योग्य मतदाताओं को पंजीकृत करना।

निर्वाचन की तिथि और समय-सारणी निर्धारित करना एवं नामांकन पत्रों का परीक्षण करना।

राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना एवं उन्हें निर्वाचन चिन्ह आवंटित करना।

राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने और चुनाव चिन्ह देने के मामले में हुए विवाद के समाधान के लिए न्यायालय की तरह काम करना।

निर्वाचन व्यवस्था से संबंधित विवाद की जांच के लिए अधिकारी नियुक्त करना। निर्वाचन के समय दलों व उम्मीदवारों के लिए आचार संहिता निर्मित करना।

स्रोत – द हिन्दू

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