अमेरिका और “नाटो” सदस्य देशों का अफगानिस्तान से बाहर जाने का फैसला

अमेरिका और  “नाटो” सदस्य देशों का अफगानिस्तान से बाहर जाने का फैसला

नाटो ने घोषणा की है कि, नाटो कमांड के तहत विदेशी सेना, अमेरिका के साथ 11 सितंबर, 2021 तक वापस आ जाएगी।वापसी के बाद, अमेरिकी सेना और नाटो का उद्देश्य, अफगान सैन्य और पुलिस बलों पर भरोसा करना है, जिसे उन्होंने सुरक्षा को बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर के वित्तपोषण द्वारा विकसित किया है ।

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन

  • नाटो की स्थापना 4 अप्रैल, 1949 को 12 संस्थापक सदस्यों द्वारा अमेरिका के वाशिंगटन में स्थापित किया गया था। यह एक अंतर- सरकारी सैन्य संगठन है।
  • इसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में है। वर्तमान में इसके सदस्य देशों की कुल संख्या 30 है। यह यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों के मध्य एक सैन्य गठबंधन है।
  • नाटो स्थापना के समय इसका प्रमुख उद्देश्य पश्चिम यूरोप में सोवियत संघ की साम्यवादी विचारधारा के प्रसार को रोकना था।
  • यह संगठन आतंकवाद की समस्या से निपटने के साथ-साथ एक आतंकवादी हमले के परिणामों का प्रबंधन करने के लिए नवीन क्षमताओं और प्रौद्योगिकियों का विकास एवं ख़ोज करता है।
  • नाटो शांतिपूर्ण तरीके से विवादों और समस्याओं को हल करने के लिये राजनयिक प्रयास करता है परन्तु यदि ये प्रयास असफल होते है तो उसे इस प्रकार के संकट प्रबंधन कार्यों के लिये सैन्य शक्ति का भी प्रयोग करना पड़ता है।
  • नाटो के सदस्य देश: अल्बानिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, बेल्जियम, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, एस्टोनिया, फ्राँस, लातविया, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, रोमानिया,नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम, पोलैंड, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, लिथुआनिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की और मॉन्टेनेग्रो।

नाटो की ऐतिहासिक पृष्टभूमि:

वर्ष 1948 में सोवियत संघ द्वारा बर्लिन की नाकेबंदी करने के कारण पश्चिमी यूरोपीय पूंजीवादी देशों को साम्यवादी विचारधारा के प्रसार का भय सताने लगा, अतः पश्चिमी यूरोपीय देशों की सुरक्षा के लिये, अमेरिकी नेतृत्व में नाटो नामक  संगठन का निर्माण किया गया ।नाटो के जवाब में सोवियत संघ ने वारसा पैक्ट किया। इस पूरे घटनाक्रम में  शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिला जिसके कारण अमेरिका और सोवियत संघ के संबंध और अधिक तनावपूर्ण होते गए।

स्रोत – द हिन्दू

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