अधिकरण सुधार विधेयक 2021 (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्ते)

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अधिकरण सुधार विधेयक 2021 (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्ते)

अधिकरण सुधार विधेयक 2021 (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्ते)

  • हाल ही में केंद्र सरकार ने अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्ते) विधेयक, 2021 प्रस्तुत किया है।
  • यह विधेयक अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्ते) अध्यादेश (Tribunal Reforms (Rationalisation and Conditions of Service) Ordinance), 2021 को प्रतिस्थापित करेगा।
  • विधेयक में, ‘अधिकरण’ (ट्रिब्यूनल) के विभिन्न सदस्यों के लिए समान नियम और सेवा-शर्तों का प्रावधान किया गया है।
  • इसके साथ ही, विधेयक में अधिकरणों को युक्तिसंगत बनाने हेतु प्रयास के रूप में कुछ अधिकरणों को समाप्त करने प्रस्ताव किया गया है।

विधेयक की मुख्य विशेषताएं:

  • यह विधेयक कुछ मौजूदा अपीलीय निकायों को भंग करके उनके कार्यों को अन्य मौजूदा न्यायिक निकायों को स्थानांतरित करता है।
  • इनमें चलचित्र अधिनियम, प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, सीमा शुल्क अधिनियम, एकस्व (Patents) अधिनियम, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, व्यापार चिन्ह अधिनियम (Trademark Act), माल का भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम आदि शामिल हैं।
  • इस विधेयक के अनुसार अधिकरण के अध्यक्ष और इसके सदस्यों की पदावधि चार वर्ष की होगी। यह पदावधि अध्यक्ष के लिए 70 वर्ष और अन्य सदस्यों के लिए 67 वर्ष की ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगी।
  • ज्ञातव्य है कि पूर्व में, उच्चतम न्यायालय द्वारा वित्त अधिनियम 2017 की धारा 184 को निरसित कर दिया गया था। न्यायालय के अनुसार इसमें सदस्यों के लिए 4 वर्ष का कार्यकाल निर्धारित किया गया था, जो कि शक्तियों के पृथक्करण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों के विपरीत था ।
  • यह विधेयक निर्दिष्ट करता है कि अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए एक व्यक्तिकी आयु कम से कम 50 वर्ष होनी चाहिए।

सुव्यवस्थीकरण की आवश्यकता

  • सरकार के अनुसार अधिकरणों द्वारा न्यायिक प्रक्रिया को कोई विशेष गति प्रदान नहीं की गई है, जबकि कई अधिकरणों ने तो मुकदमेबाजी का अतिरिक्त स्तर जोड़ने का कार्य किया है।
  • वित्त अधिनियम 2017 के तहत सात अधिकरणों को कार्यात्मक समानता के आधार पर समाप्त या उनका विलय कर दिया गया था।

‘अधिकरण’ क्या होते हैं?

  • ‘अधिकरण’ (Tribunal), एक अर्ध-न्यायिक संस्था होते है, जिन्हें प्रशासनिक मसलों अथवा कर-संबंधी विवादों को हल करने जैसी समस्याओं के निपटान करने के लिए गठित किया जाता है।
  • अधिकरण, विवादों का फैसला करने, दावा करने वाले पक्षों के बीच अधिकारों का निर्धारण करने, प्रशासनिक निर्णय लेने, मौजूदा प्रशासनिक निर्णय की समीक्षा करने, जैसे आदि कार्य करते हैं।

संवैधानिक प्रावधान:

  • संविधान में ‘अधिकरण’, मूल रूप से इसका का भाग नहीं थे । इनको ‘स्वर्ण सिंह समिति’ की सिफारिशों के आधार पर, 42 वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया है ।
  • इस संशोधन के अंतर्गत, संविधान में ‘अधिकरणों’ से संबंधित ‘भाग XIV-A’ जोड़ा भी गया, तथा इसमें 2 अनुच्छेद शामिल किये गए:
  • अनुच्छेद 323A: प्रशासनिक अधिकरणों से संबंधित है। प्रशासनिक अधिकरण, लोक-सेवा में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों को हल करने वाली अर्ध-न्यायिक संस्थाएं हैं।
  • अनुच्छेद 323 B: अन्य विषयों जैसे कि कराधान, औद्योगिक एवं श्रम विवाद, विदेशी मुद्रा, आयात और निर्यात, भूमि सुधार, खाद्य सामग्री, नगर संपत्ति की अधिकतम सीमा, संसद और राज्य विधानमंडलों के लिये निर्वाचन, किराया और किराएदार के अधिकार, आदि का समाधान करने हेतु अधिकरणों के गठन से संबंधित है।

स्रोत – द हिन्दू

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